Friday, December 4, 2009


सियासत की गोटियां नहीं हैं गैस पीडित

सन 1984 को 2 एवं 3 दिसंबर की मध्यरात्रि भोपाल के लिये पीड़ा का सैलाब लेकर आई। इस रात को यूनियन कार्बाइड के संयंत्र से रिसी मिक गैस ने राजधानी में ऐसा वायु प्रलय मचाया कि यह झीलों का शहर आहों और आंसुओं की नदी में तब्दील हो गया। उस जानलेवा रात शहर में मौत नाच नाच कर मातम की मुनादी कर रही थी और शहर के तमाम लोग बदहवास से जान बचाने के लिए चारों तरफ भाग रहे थे। इस काली रात की सुबह हुई तो तमाम दुनिया यह जान चुकी थी कि बहुराष्टï्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड ने भोपाल की तकदीर में औद्योगिक त्रासदी के रूप में ऐसी भयावह इबारत लिख दी है कि जिसकी मिसाल दुनिया में नहीं मिलती। शहर के श्मसान एवं कब्रिस्तान भी मौत के आगोश में समाये बदकिस्मत लोगों के अंतिम संस्कार के लिए छोटे पड़ गए और मौत द्वारा फैलाए गए इस जाल से किसी तरह बच निकले लाखों लोगों में से बहुत से लोग आज भी ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं जो मौत से भी बदतर है। गैस त्रासदी की बरसी आते ही इन गैस पीडि़तों के घाव पर मरहम लगाने के नाम पर उन्हें मुआवजे, पुनर्वास तथा मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध कराने जैसे कदमों की जानकारी वाले ब्रोशर जारी कर राज्य सरकारें अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश कर लेती हैं लेकिन यक्ष प्रश्र यह है कि क्या इन गैस पीडि़तों को उनका हक मिल पाया है। इन गैस पीडि़तों को मुआवजा इस अंदाज में बांटा गया है मानो उनके आत्म सम्मान की बोली लगाई जा रही हो। आज भी अस्पतालों की अव्यवस्था इतनी भयावह है कि ये अस्पताल कई बार तो गैस पीडि़तों के यातनागृह नजर आते हैं। गैस प्रभावित बस्तियों में श्वास तथा अन्य कई गंभीर बीमारियों के कारण रेंगती जिंदगियां हर कदम पर देखी जा सकती हैं। अभी कल ही जारी हुई ईएसई की रिपोर्ट के अनुसार यूका कचरे के कारण इन बस्तियों का भूजल भी इतना जहरीला हो गया है कि आने वाली पीढिय़ों पर भी धीमी मौत का खतरा मंडराने लगा है। हम हर साल गैस कांड की बरसी पर मशाल जुलूस निकालकर और जंगी प्रदर्शन करके -डाउन विथ एंडरसन- तथा -मौत के सौदागरों को फांसी दो- जैसे नारे लगाते हैं लेकिन इस मुकदमे का यह आलम है कि गैस कांड के आरोपी मौत के सौदागर आज भी बेखौफ घूम रहे हैं। लोगों की धारणा है कि बहुराष्टï्रीय कंपनियों एवं सत्ता के बीच मिलीभगत भी इस विलंब के लिए जिम्मेदार है। इस मामले में कोई भी सरकार दूध की धुली नहीं रही है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विभिन्न राजनीतिक दल गैस पीडि़तों के नाम पर अपनी वोट बैंक की राजनीति साधने की कोशिश में जुटे हुए हैं। गैस पीडि़तों के ध्वजवाहक होने का दावा करने वाले कुछ संगठन भी जाने-अनजाने इसमें मददगार हो रहे हैं जो गैस पीडि़तों के साथ छल के अलावा कुछ नहीं है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि गैस पीडि़तों के हक की लड़ाई कमजोर पड़ रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि गैस कांड की पच्चीसवीं बरसी पर तो कम से कम सरकार, गैसपीडि़तों के संगठन, राजनीतिक दलों सहित वे तमाम पक्ष, जो खुद को गैसपीडि़तों का मसीहा बताते नहीं थकते, आत्म विश्लेषण एवं आत्मालोचन करेंगे और ईमानदारी से संकल्प करेंगे कि वे तब तक चैन की सांस नहीं लेंगे जब तक कि गैसपीडि़तों को पूरी तरह न्याय नहीं मिल जाता।

-सर्वदमन पाठक

Tuesday, December 1, 2009

आतंकवाद का पैैैशाचिक चेहरा

एक पुलिसकर्मी सहित तीन लोगों को गोलियों से भून डालने की खंडवा में हुई आतंकवादी वारदात प्रदेश में आतंकवाद के पुन: सिर उठाने का संकेत है। सरकार की यह स्वीकारोक्ति भी इसका प्रमाण है कि इस घटना के पीछे आतंकवादी हाथ होने की संभावना है। यदि मीडिया की खबरों पर भरोसा किया जाए तो सिमी के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ का बदला लेने के लिए यह कार्रवाई की गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इस वारदात को अंजाम देने वाला आतंकवादी भाग निकला और उसे अभी तक पकड़ा नहीं जा सका है। यदि कोई आतंकवादी बेगुनाहों की जान लेने के अपने नापाक मंसूबों को सरे बाजार अंजाम देकर फरार होने में सफल हो जाए तो इससे पुलिस सहित समूची सुरक्षा व्यवस्था की क्षमता तो संदेह के दायरे में आती ही है, उन लोगों के मानवीय फर्ज पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है जो घटना के वक्त वहां मौजूद थे और इस घटना के चश्मदीद गवाह थे लेकिन उन्होंने राष्टï्र के इस दुश्मन को पकडऩे का जज्बा नहीं दिखाया। राष्टï्र के प्रति अपनी निष्ठïाएं इतनी कमजोर क्यों होनी चाहिए कि आतंकवाद उस पर भारी पड़ जाए। सवाल यह भी है कि आखिर हमें अपनी सुरक्षा के लिए सिर्फ पुलिस तथा सुरक्षा बलों पर ही आश्रित क्यों रहना चाहिए। राज्य सरकार ने इस घटना के बाद संकल्प व्यक्त किया है कि इसके आरोपी को शीघ्र ही सींखचों के पीछे लाया जायेगा और इसे इसकी करनी की समुचित सजा दिलाई जाएगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घटना के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि राज्य में आतंकवाद को समूल नष्टï किया जाएगा। राज्य सरकार की यह घोषणा कुछ भरोसा अवश्य दिलाती है लेकिन वास्तविकता पर नजर डालें तो यही प्रतीत होता है कि पिछले कुछ सालों में प्रदेश में आतंकवादी गतिविधियां काफी फैलती रही हैं। विशेषत: सिमी की गतिविधियों में कुछ वर्षों से काफी इजाफा हुआ है। मालवा में तो मानो आतंकवाद की फैक्टरी ही चल रही थी। इतना ही नहीं, आतंकवाद की प्रतिक्रियास्वरूप भी यहां एक तरह के उग्रवाद ने सिर उठा लिया था और सरकार इसका खात्मा करने में सफल नहीं रही। आतंकवाद के सफाये के लिए जरूरी है कि शासन प्रशासन इसके लिए पूरी ईमानदारी से अभियान चलाए और वोट बैंक की खातिर किसी भी तरह के आतंकवाद के प्रति नरम रुख न अपनाए। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार आतंकवाद के सफाये के अपने वादे पर खरी उतरेगी और प्रदेश में विकास के लिए जरूरी शांति का वातावरण बनाने में कामयाब होगी।

-सर्वदमन पाठक

Friday, November 20, 2009

राजनीतिक शतरंज का मोहरा नहीं है किसान

राज्य में किसानों की मुसीबतें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। बेमौसम बेपनाह बारिश से किसानों के माथे पर आईं चिंता की रेखाएं मौसम सुहाना होने से कुछ कम हुईं तो अब खाद के अभाव का संकट उनके सामने खड़ा है। वैसे प्रदेश में बिजली का संकट ज्यादा गंभीर नहीं है लेकिन विद्युत वितरण कंपनी के दोषपूर्ण तौर तरीके से विभिन्न जिलों के कई गांवों में अंधेरा छाया है। इन तथ्यों के कारण किसान गुस्से में हैं और विरोध के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। मसलन खाद की कमी से उत्तेजित किसानों ने बैतूल-इंदौर मार्ग पर चक्काजाम कर दिया और उन्हें इसके लिए लाठियां भी झेलनी पड़ीं। जबलपुर जिले में विद्युत मंडल होने के कारण किसानों को यह उम्मीद होना स्वाभाविक है कि उन्हें बिजली के मामले में मंडल की बेरुखी का शिकार नहीं होना पड़ेगा, लेकिन वे इस मामले में नाउम्मीद हुए हैं। जिले के 29 गांवों में अंधेरा पसरा हुआ है जो आमतौर पर विद्युत मंडल की बदइंतजामी का नमूना है। राज्य के अन्य हिस्सों में भी किसानों को खाद एवं बिजली की कमी का सामना करना पड़ रहा है। वैसे तो किसान देश-प्रदेश का सबसे बड़ा वोट बैंक है। इसलिए सभी राजनैतिक दल किसानों के हितों की रक्षा का राग अलापते रहते हैं लेकिन उनके हितों की कितनी चिंता उन्हें वास्तव में होती है यह उनकी दुर्दशा देखकर ही अहसास होता है। दरअसल चुनावों के वक्त किसानों से तमाम तरह के लुभावने वायदे राजनीतिक दलों द्वारा किये जाते हैं। यह सब उनसे वोट हासिल करने वाले टोटके ही होते हैं। लेकिन एक बार चुनाव जीत जाने के बाद राजनीतिक दल किसानों को भूल जाते हैं। मध्यप्रदेश में भी कमोवेश यही कुछ हो रहा है। विडंबना तो यह है कि किसानों के हितों को लेकर राज्य के दो मंत्रियों में भी मतभेद उभर आए हैं। कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया ने कहा है कि हाल की बारिश से किसानों की फसलों को नुकसान हुआ है लेकिन गोपाल भार्गव ऐसा नहीं मानते। क्या किसानों के हितों के लिए भी पूरी सरकार एकजुट नहीं हो सकती। यदि राज्य सरकार को किसानों की तनिक भी चिंता है तो उसे तुरंत ही उनके हितों के लिए सक्रिय होना चाहिए। इस समय किसानों की सबसे बड़ी जरूरत खाद एवं बिजली ही है। सरकार को इनकी कमी दूर करने के लिए हरसंभव कदम उठाने चाहिए। यदि इस समय किसानों की जरूरत को पूरा करने के लिए शहरों की बिजली में भी कुछ कटौती करनी पड़े तो इस मामले में संकोच नहीं किया जाना चाहिए। यदि हाल की वर्षा से किसानों की फसलों को कुछ नुकसान हुआ है तो उसकी क्षतिपूर्ति भी की जानी चाहिए। अब किसानों में जागरूकता आ रही है और वह राजनीतिक दलों की शतरंज की बिसात पर मोहरा बनने के लिए तैयार नहीं हैं। यह बात सभी राजनीतिक दलों को भलीभांति समझ लेना चाहिए।

-सर्वदमन पाठक

Tuesday, November 17, 2009

सेहत के सुहाने सपने और कड़वा सच

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का यह जुमला काफी चर्चित रहा है कि वे सपनों के सौदागर हैं। स्वाभाविक है कि राज्य सरकार अपने नेता की इस भूमिका को अपने कार्यों से लगातार पुख्ता करने की कोशिश करती रहती है। राज्य सरकार की एक नई घोषणा इसी हकीकत का अहसास कराती है। राज्य सरकार की इस घोषणा के अनुसार राज्य में बारह नए मेडिकल कालेज खोले जाएंगे। इस घोषणा से लोगों को यह सपना परोसने की कोशिश की गई है कि राज्य सरकार उनकी जिंदगी और सेहत की सुरक्षा को लेकर काफी गंभीर है और ताजा कदम इसी दिशा में है। इन मेडिकल कालेजों से राज्य को डाक्टरों की कमी से निजात पाने में मदद मिलेगी, यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे समझने के लिए लोगों को अपने माथे पर जोर देना पड़े लेकिन इसके साथ ही यह भी सोचना जरूरी है कि पहले से कार्यरत मेडिकल कालेजों की क्या हालत है और उनसे पास होने वाले डाक्टर किन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। राज्य सरकार के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात क्या होगी कि देश में जिन सरकारी मेडिकल कालेजों की मान्यता मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया द्वारा स्थगित कर दी गई है उनमें अधिकांश कालेज मध्यप्रदेश के ही हैं। दिलचस्प बात यह है कि राज्य सरकार का चिकित्सा शिक्षा विभाग इस मामले को लेकर कतई चिंतित नहीं है कि इन कालेजों से निकलने वाले डाक्टरों का क्या भविष्य होगा। यह कोई रहस्य नहीं है कि पिछले साल सीबीएसई की पीजी परीक्षा के जो फार्म आए थे, उसमें इन कालेजों का कोड शामिल नहीं था तब केंद्र की काफी मिन्नत के बाद इन कालेजों से उत्तीर्ण डाक्टरों को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी गई थी। इस वर्ष भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। एमसीआई अभी भी इन मेडिकल कालेजों में टीचिंग स्टाफ और अन्य सुविधाओं से संतुष्टï नहीं है और इस बात की कोई संभावना फिलहाल नजर नहीं आती कि इस बार भी उनके कालेज का कोड फार्म में शामिल होगा। इस बार भी वही कुछ होगा जो पिछले साल हुआ था लेकिन राज्य के चिकित्सा शिक्षा विभाग की नींद अभी भी टूटी नहीं है। यदि एमसीआई के रुख में कोई परिवर्तन नहीं आया तो इन कालेजों से उत्तीर्ण होने वाले डाक्टरों को राज्य के सरकारी चिकित्सालयों एवं अन्य राज्यों के चिकित्सालयों में नियुक्ति नहीं मिल सकेगी। राज्य सरकार अपने वेतन ढांचे के कारण राज्य के डाक्टरों में सरकारी चिकित्सालयों के प्रति भरोसा नहीं जगा पाई है जिसके परिणामस्वरूप नए डाक्टर तक सरकारी अस्पतालों की अपेक्षा प्रायवेट चिकित्सालयों में अपनी सेवाएं देना ज्यादा पसंद करते हैं। इसी वजह से सरकारी चिकित्सा प्रणाली अपंग सी पड़ी हुई है। फिर इस बात की क्या गारंटी है कि नए मेडिकल कालेजों से उत्तीर्ण होने वाले डाक्टर सरकारी चिकित्सालयों विशेषत: ग्रामीण चिकित्सालयों में अपनी सेवाएं देंगे। यदि डाक्टरी पेशे में आने वाले नवयुवकों में जनसेवा की भावना नहीं जगाई गई तो पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप के तहत खोले जाने वाले मेडिकल कालेज भी प्रायवेट अस्पतालों में पूंजीपतियों के लिए तैनात रहने वाले डाक्टरों की नई फौज खड़ी कर दें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। अत: राज्य सरकार को चिकित्सा शिक्षा के विस्तार के साथ साथ ऐसे चिकित्सा ढांचे को भी तैयार करना चाहिए जो गरीबों के कल्याण की भावना से प्रेरित हो और ग्रामीण एवं शहरी गरीबों के जीवन एवं सेहत की सुरक्षा व संवद्र्धन के लिए सरकारी चिकित्सालयों में अपनी सेवाएं दे और स्वस्थ प्रदेश के निर्माण में अपनी सार्थक भूमिका निभाए।



-सर्वदमन पाठक

पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल

भोपाल के प्रमुख प्रापर्टी बिल्डर जयप्रकाश सिंह एवं उनके पुत्र की मौत ने शहर में जबर्दस्त सनसनी फैला दी है। इस मामले ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिये हैं जिनसे आज समाज एवं आम आदमी को जूझना पड़ रहा है। मसलन यह सवाल लोगों की जुबान पर है कि क्या संपन्नता से जुड़ी प्रतिस्पर्धा मौत का कारण बन सकती है। इसके साथ ही यह बात भी लोगों को शिद्दत से महसूस होती है कि पुलिस अपराधियों के सामने भीगी बिल्ली क्यों बनी रहती है। क्या अपराधियों से साठगांठ के कारण ही वह तमाम जघन्य अपराधों पर पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है। इस मामले में जो हकीकत बेनकाब हुई है, उससे यह सवाल उभरा है। विभिन्न अखबारों में पुलिस के हवाले से छपी खबरों पर भरोसा किया जाए तो उनके मुताबिक जयप्रकाश सिंह का कुछ दिनों पूर्व अपहरण किया गया था और उसे इंदौर में रखकर उसके साथ मारपीट की गई थी। इस मारपीट के बल पर उससे एक फार्म हाउस पर कब्जे के कागजात पर हस्ताक्षर करवा लिए गए थे। इसके साथ ही कुछ गुंडों ने भोपाल आकर उसके परिजनों को धमकाया था कि यदि उन्होंने पुलिस को इसके बारे में बताया तो उन्हें खत्म कर दिया जाएगा। इस मामले में यह बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जयप्रकाश सिंह थोड़े ही समय में संपन्नता की सीढिय़ां चढ़ गए थे और इस प्रक्रिया में संभवत: उनकी कुछ प्रभावी लोगों से शत्रुता हो गई हो। लेकिन इस मामले में एक शराब व्यवसायी द्वारा अपने हितों को साधने के लिए जिस तरह से किराये के गुंडों का इस्तेमाल किया गया और पुलिस इस मामले में खामोश और निष्क्रिय बनी रही, उससे पुलिस की भूमिका संदेह के दायरे में आ गई है। इतना ही नहीं, उक्त शराब व्यवसायी को पकडऩे गई पुलिस उसके निवास पर पर्ची देकर बेफिक्र हो गई मानो उक्त व्यवसायी खुद को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने जा रहा हो जबकि वह चकमा देकर पिछले रास्ते से भाग निकला। इससे यह संदेह उपजना स्वाभाविक है कि क्या पुलिस ने उसको खुद ही भागने का मौका उपलब्ध कर दिया। यह मानना काफी कठिन है कि पुलिस को इस पूरे मामले की कोई खबर नहीं रही होगी लेकिन यदि यह मान भी लिया जाए तो फिर उसकी गुप्तचर शाखा की क्षमता पर सवाल उठ खड़ा होता है। इस तथ्य के मद्देनजर इस मामले की गंभीरता और ज्यादा बढ़ जाती है कि जयप्रकाश सिंह प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह का करीबी रिश्तेदार था और उसकी कई मंत्रियों और आईएएस अफसरों के यहां काफी गहरी पैठ थी। फिर भी वह अपहृत हुआ, जबर्दस्त मारपीट का शिकार हुआ, और अंतत: खुद खुदकुशी करने के मजबूर हो गया लेकिन इसके बावजूद पुलिस अपनी अक्षमता या संभवत: अपराधियों से साठगांठ के चलते निष्क्रिय बनी रही। यह सच है कि न्याय का यही तकाजा है कि पूरा सच सामने आए बिना किसी को भी दोषी ठहराना या संदेह के दायरे से मुक्त किया जाना उचित नहीं है लेकिन देखना यह है कि क्या इस मामले मेंं पूरी सच्चाई सामने आएगी और दोषियों को सजा मिल पाएगी। इसके साथ ही यह यक्ष प्रश्न भी उठता है कि क्या पुलिस अपराधों एवं अपराधियों के प्रति नरमी छोड़कर उनके जुल्मों से लोगों को निजात दिला पाएगी?



-सर्वदमन पाठक

Saturday, November 14, 2009

वंदे मातरम पर विवाद राष्टï्रविरोधी

यह भी एक विडंबना ही है कि भारत को मजहबों की संकीर्ण दीवारों में बांटने की सोची समझी साजिश के तहत राष्टï्र के गौरव चिन्हों के खिलाफ फतवे जारी किये जा रहे हैं और राष्टï्र की अस्मिता के झंडावरदार बनने वाले नेता खामोशी का रुख अख्तियार किये हुए हैं। यह सवाल देवबंद के दारुल उलूम द्वारा वंदेमातरम के खिलाफ जारी फतवे का जमायते उलेमा-ए-हिंद द्वारा समर्थन करने से उठ खड़ा हुआ है। इस मामले में सबसे अफसोस की बात यह है कि हमारे देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम एवं एक अन्य मंत्री सचिन पायलट इस सम्मेलन में शिरकत करते हैं और इस फतवे के खिलाफ एक भी शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। इतना ही नहीं, सचिन पायलट तो बाकायदा इस फतवे का समर्थन करते हुए बोलते हैं कि इसे गाने के लिए किसी को विवश नहीं किया जा सकता। क्या ये मंत्री उस सरकार का प्रतिनिधित्व करने के अधिकारी हैं, जो पंथनिरपेक्षता के प्रति वचनबद्धता का दावा करते नहीं थकती। वंदे मातरम दरअसल भारत का गौरवगान ही है जिसे गाते हुए क्रांतिकारी राष्टï्र की आजादी के समर में हंसते हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दिया करते थे। लेकिन आज आजादी के इसी तराने को देश को सांप्रदायिक आधार पर बांटने के नापाक इरादों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन इसका दोष सिर्फ इन सांप्रदायिक ताकतों को देना उचित नहीं होगा क्योंकि पिछले दो दशक से भारतीय राजनीति में आई तब्दीली भी इसके लिए जिम्मेदार है जिसके तहत हिन्दुस्तान में रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा जैसे उत्तेजना फैलाने वाले नारों की बाढ़ आ गई थी। यदि इस गीत के ऐतिहासिक संदर्भ पर नजर डालें तो बंकिम चंद चटर्जी द्वारा रचित पुस्तक आनंदमठ का यह गीत इसमें भी एक क्रांति घोष ही है। यह भी एक विडंबना ही है कि मुस्लिम लीग ने देश के विभाजन के लिए वंदे मातरम के खिलाफ जो जहरीला अभियान चलाया था, आजाद भारत में भी कुछ राष्टï्रविरोधी मानसिकता के लोग इसे अपने सियासी फायदे के लिए जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं। सच तो यह है कि वंदे मातरम के रूप में वे ऐसे मुद्दे को उठा रहे हैं जिसका समाधान राष्टï्र की आजादी के बाद हमारे संविधान में खोज लिया गया था। राष्ट्रीय गीत के खिलाफ जो तर्क पेश किए जा रहे हैं वही तर्क कभी मुस्लिम लीग ने देश के बंटवारे की मांग के समर्थन में गढ़े थे। मुस्लिम लीग ने 1940 में औपचारिक रूप से देश के बंटवारे की मांग से कुछ पहले ही वंदेमातरम के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था। जिन्ना ने 1937 में मुस्लिम लीग कांफ्रेेंस में देश के विभाजन के लिए जो दलीलें रखी थीं उनमें राष्ट्रीय झंडे, वंदेमातरम और हिंदी का विरोध प्रमुख था। मुसलमानों को सांप्रदायिक रूप से हिंदुओं के खिलाफ खड़ा करने की साजिश के तहत जिन्ना ने यह दुष्प्रचार किया था कि झंडा, गीत और भाषा, तीनों ही हिंदुओं के प्रतीक चिह्नï हैं, इसलिए ये मुसलमानों को अस्वीकार्य हैं। बंटवारे की नियति को टालने के लिए भारत के राजनेताओं ने वंदेमातरम के पहले दो छंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकारने की बात की, जिनमें उन उपहारों का वर्णन था, जो प्रकृति ने भारत पर न्यौछावर किए हैं, किंतु इसके बावजूद जिन्ना की हठधर्मिता के कारण जिन्ना की देश के बंटवारे और इस्लामिक राष्ट्र की स्थापना की महत्वाकांक्षा पूरी हो गई।
राष्टï्र-विभाजन तथा अलग मुस्लिम राष्ट्र की स्थापना के बावजूद भारत ने पंथनिरपेक्ष की नीति को ही अपना सैद्धांतिक आधार बनाया और अल्पसंख्यकों के अत्यंत ही छोटे से वर्ग की असहमति को भी नजरअंदाज न करते हुए वंदेमातरम के पहले दो छंदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया। इन दो छंदों में कहीं भी ऐसा कुछ नहीं है जिससे किसी धर्म के लोगों के भावनाओं को ठेस पहुंचे लेकिन इसके बावजूद जिन्ना की विचारधारा को न केवल सीना ठोक कर आगे बढ़ाने की हिमाकत की जा रही है बल्कि छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपनी राजनीतिक दूकान चलाने वाले लोग इस राष्टï्रघाती प्रवृत्ति पर या तो खामोश हैं या फिर उसका परोक्ष समर्थन करते नजर आ रहे हैं। वंदे मातरम हमारी मातृभूमि का गीत है, जिसमें भारत पर प्रकृति के वरदान की बात कही गई है। इसमें अनेक नदियों, हरे-भरे खेत-खलिहानों और आच्छादित वृक्षों का वर्णन है। वंदे मातरम का विरोध करने वालों से यह पूछा जाना चाहिए कि उन्हें आपत्ति किस बात पर है? सदियों से सैकड़ों भाषाओं में कवियों ने प्रकृति और अपनी मातृभूमि की स्तुति की है। क्या हमें हर कवि की रचनाओं का सांप्रदायिक आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए? हमारे संविधान निर्माता वंदेमातरम के प्रति आम जनमानस में सम्मान से भलीभांति परिचित थे। 14 अगस्त 1947 को संविधान सभा के ऐतिहासिक सत्र की शुरुआत सुचेता कृपलानी द्वारा वंदेमातरम के पहले पद को गाने से हुई।
संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई। इस बैठक की शुरुआत राष्ट्रगान पर अध्यक्ष डा. राजेंद्र प्रसाद के संबोधन से हुई। राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि जन गण मन के रूप में संकलित शब्द और संगीत भारत का राष्ट्रगान है और स्वाधीनता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाला वंदेमातरम जन गण मन के बराबर सम्मान का अधिकारी होगा। हस्ताक्षर समारोह के बाद पूर्णिमा बनर्जी और अन्य सदस्यों ने जन गण मन गाया और फिर लक्ष्मीकांता मैत्र तथा साथियों ने वंदेमातरम का गायन किया। संविधान सभा द्वारा तय कर दिये गए इस इस मुद्दे पर किसी को भी फिर से विवाद खड़ा करने अथवा राष्ट्रीय गीत का अपमान करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जमीयत का रुख किसी इस्लामी देश में सही हो सकता है, लेकिन यह भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के बुनियादी सिद्धांतों के प्रतिकूल है। प्रश्न यह है कि आज जिस तरह वंदेमातरम पर आपत्ति जताई जा रही है उसी प्रकार कल क्या जन गण मन, अशोक चक्र पर उंगली उठाई जाएगी? जो लोग सामाजिक सौहार्द और भाईचारे को बढ़ावा देने के इच्छुक हैं उन्हें इस सिलसिले को हमेशा के लिए विराम देना ही होगा क्योंकि अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर चल रहे इस सिलसिले ने फिरकापरस्ती को इस ऊंचाई पर पहुंचा दिया है कि वह कुछ सेकुलर प्रतीकों तक का निरादर करने लगी हैं।

-सर्वदमन पाठक