Wednesday, December 16, 2009

कमला बुआ की जीत के निहितार्थ

मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों की चुनावी जंग में सबसे दिलचस्प फैसला सागर से आया है जहां महापौर पद के चुनाव में किन्नर कमला बुआ ने भाजपा तथा कांग्रेस सहित तमाम प्रत्याशियों को चारों खाने चित्त कर अपना विजय ध्वज लहरा दिया है। इस परिणाम से भाजपा एवं कांग्रेस का चकित और लज्जित होना स्वाभाविक है क्योंकि एक किन्नर के हाथों उनकी इज्जत लुट गई है। लेकिन सागर की चुनावी फिजा से वाकिफ पर्यवेक्षकों को इस परिणाम से कोई आश्चर्य नहीं हुआ है क्योंकि इन दलों से उपजी नाउम्मीदी से सागर के मतदाता इस बुरी तरह निराश एवं हताश थे और वे उन्हें ऐसा झटका देने का मन बना चुके थे जिसे भुला पाना भी इन पार्टियों के लिए मुश्किल हो। इसी रणनीति के तहत वहां से मेयर पद के लिए किन्नर प्रत्याशी खड़ी की गई और सागरवासियों उसे भरपूर वोट देकर उसकी जीत को सुनिश्चित किया। इस फैसले के जरिये सागरवासियों ने यह संदेश इन पार्टियों को दे दिया कि किन्नर उनकी अपेक्षा कहीं ज्यादा भरोसेमंद है। निश्चित ही पार्टियों के लिए यह फैसला एक अपमान के कड़वे घूंट की तरह रहा है लेकिन सागरवासियों के इस फैसले के लिए ये पार्टियां खुद ही जिम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने सागर के विकास के लिए वस्तुत: कुछ नहीं किया। पूर्व में यहां की राजनीति पर कांग्रेस का कब्जा था और पिछले एक दशक से तो सियासी आधार पर चुनी जाने वाली वहां की तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भाजपा का वर्चस्व है। सांसद, विधायक एवं नगरीय निकाय तक हर जगह उसी का बोलबाला नजर आता है और प्रदेश में उसी की सरकार है लेकिन सागर विकास के लिए तरसता रहा है। औद्योगिक विकास के नाम पर वहां के नेताओं ने ढेर सारे सब्जबाग सागरवासियों को दिखाए लेकिन वहां आज भी उद्योगों का नितांत अभाव है जिसकी वजह से बेइंतहा बेरोजगारी का आलम है। हालत यह है कि देश के शीर्षस्थ विश्वविद्यालयों में शुमार गौर विश्वविद्यालय बेरोजगारों की फेक्टरी में तब्दील हो गया दिखता है। वहां नगरीय सुविधाओं का तो भारी टोटा है ही, नगरीय चेतना जगाने के लिए भी कोई प्रयास नहीं किया गया है और उसके लिए भाजपा एवं कांग्रेस को जवाबदेही से कतई बरी नहीं किया जा सकता। कमला जान की जीत के माध्यम से लोगों ने सिर्फ इन दलों को नकारा ही नहीं है बल्कि काफी हद तक उनके बड़बोलेपन के प्रति उपजे आक्रोश को प्रदर्शित किया है। देखना है कि अपनी इस अपमानजनक हार से सबक लेकर भाजपा और कांग्रेस पुन: जनता के प्रति अपने दायित्वों के निर्वाह का संकल्प लेती हैं या नहीं।
-सर्वदमन पाठक

Tuesday, December 15, 2009

अथ पुलिस पिटाई कथा

भोपाल में पुलिस के मनोबल की क्या स्थिति है, यह एक घटना से बखूबी समझा जा सकता है। इस घटना का लब्बोलुवाब यही है कि छेड़छाड़ और मारपीट के एक आरोपी को ले जा रही पुलिस की जीप पर कुछ बदमाशों ने हमला कर दिया। इन बदमाशों ने जीप में तोडफ़ोड़ कर दी और पुलिसकर्मियों की पिटाई कर आरोपी को छुड़ा ले गए। हमारे रणबांकुरे पुलिस जवान इन बदमाशों से निरीह से पिटते रहे। यह अलग बात है कि बाद में उक्त आरोपी को पुलिस में गिरफ्त में ले लिया। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि जो पुलिस बदमाशों के हाथों पिट जाएगी, वह इन बदमाशों से लोगों की रक्षा कैसे कर पाएगी। वैसे यह कोई पहला वाकया नहीं है जब बदमाश पुलिस पर भारी पड़े हैं। निकट अतीत में प्रदेश में कई स्थानों पर ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं जिसमें पुलिस की बेचारगी झलकती है। थानों का घेराव आम बात हो ही गई है, कई स्थानों पर थानों पर हमले भी हुए हैं। इसको आप पुलिस की लाचारगी नहीं तो और क्या कहेंगे। लेकिन इसके लिए कई कारक जिम्मेदार हैं, जिन पर गंभीरता के साथ विचार की जरूरत है। मसलन पुलिस आम तौर पर निरपराधों को ही अपना निशाना बनाती है और अपराधियों से हफ्ता वसूलकर उन्हें बख्शती रहती है। इससे लोगों में आक्रोश भड़कना स्वाभाविक है। जब यह आक्रोश सीमा पार कर जाता है तो फिर बिना किसी अंजाम की परवाह किये लोग पुलिस से प्रतिशोध लेने की ठान लेते हैं। यदि पुलिस इस मामले में आत्मालोचन करे तो उसे आम लोगों के आक्रोश का कारण समझ में आ जाएगा। दरअसल पुलिस का चारित्रिक पतन ही उसकी इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। यदि पुलिस अपनी मूल ड्यूटी भूलकर सरकारी हितों को साधने के लिए काम करना शुरू कर दे तो इसे भी पुलिस के चारित्रिक पतन की श्रेणी में रखा जा सकता है। सिर्फ सरकार ही क्यों, पुलिस अफसरों के अलग अलग राजनीतिक आका होते हैं जिनमें विपक्ष के नेता भी शामिल हैं। उक्त तमाम कारकों का स्वाभाविक परिणाम यही होता है कि विभिन्न राजनीतिक नेताओं एवं राजनीतिक दलों से जुड़े अपराधियों पर पुलिस आम तौर पर हाथ नहीं डालती। कई बार पुलिस उन पर हाथ डालने की जुर्रत करती है तो उन्हें राजनीतिक कार्यकर्ताओं के गुस्से का शिकार होना पड़ता है। भोपाल में तो यह आए दिन की बात हो गई है कि सत्तारूढ़ दल के किसी भी कार्यकर्ता को पुलिस किसी आरोप में पकड़कर लाती है तो इस राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं का हुजूम पुलिस थाने पहुंच जाता है और पुलिस अफसरों और पुलिस कर्मियों से दुव्र्यवहार और कई बार तो झूमाझटकी करके उक्त आरोपी को छुड़ा ले जाता है। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में यही कुछ कांग्रेस करती थी जिसके इक्का दुक्का उदाहरण आज भी देखे जा सकते हैं। यदि पुलिस को इस दुर्गति से मुक्ति पानी है तो उसे चारित्रिक सुधार करना होगा और राजनीतिक कारणों से अपराधियों को पकडऩे या छोडऩे की प्रवृत्ति छोडऩी होगी। इसके साथ ही माफिया एवं अपराधियों के हाथों में खेलना और निरपराधों को उनके इशारे पर फंसाना बंद करना होगा लेकिन जब तक पुलिस के अभियान में सरकार का सहयोग न मिले, तब तक यह अभियान सफल होना संभव नहीं है।
-सर्वदमन पाठक

Thursday, December 10, 2009

चुनाव यज्ञ में सार्थक हिस्सेदारी करें

मध्यप्रदेश में होने जा रहे विभिन्न नगर निकाय चुनावों मेें मतदान का अंतिम दौर 14 दिसंबर को संपन्न हो जाएगा और प्रत्याशियों की किस्मत सील हो जाएगी। चुनाव प्रचार का जितना सघन अभियान इस नगर निकाय चुनाव में देखा गया है, वह नगरीय चुनाव में शायद ही देखने मिलता है। यह चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच शक्ति प्रदर्शन जैसा प्रतीत हो रहा है और इन दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों ने अपनी पूरी ताकत चुनाव में झोंकी हैं। संसाधनों का अंधाधुंध इस्तेमाल इसका प्रमाण है। इतना ही नहीं, बाहुबल के जरिये भी मतदाताओं को प्रभावित करने का भरपूर प्रयास किया गया है। कई क्षेत्रों में निर्दलीय व अन्य दलों के प्रत्याशियों के रूप मेें खड़े हुए बाहुबली अथवा धनपति भी अपनी चुनावी संभावनाओं को उज्जवल बनाने के लिए बाहुबल एवं धनबल का सहारा लेने से बाज नहीं आए हैं। इधर यह भी खबर है कि मतदाताओं से परिचय पत्र न मांगने के भी निर्देश दिये गए हैं जिससे फर्जी मतदान की संभावना को बल मिला है। यह आश्चर्यजनक है कि यह सब कुछ बिना किसी खास अवरोध के किया जा रहा है। इससे यही महसूस होता है कि इसमें किसी भी कोई ऐतराज नहीं है मानो मौका लगते ही सत्ता एवं विपक्ष में बैठे तमाम दल और प्रत्याशी इस मामले में बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहते हों। यदि इस निर्देश से फर्जी मतदान को बढ़ावा मिलता है तो यह निश्चित ही लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ होगा। दरअसल फर्जी मतदान मतदाताओं के अधिकार पर डाका ही है। जब सरकार एवं विपक्ष दोनों ही इस सिलसिले में जानबूझकर मौन हैं तो फिर सारी जिम्मेदारी मतदाताओं पर ही आ टिकती है। मतदाताओं को इस राजनीतिक साजिश को नाकामयाब करने के लिए आगे आना चाहिए और मतदान के दिन यथाशीघ्र अपने वोट का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि कोई उनके वोट को फर्जी तरीके से न डाल सके। लेकिन सिर्फ इससे ही उनका फर्ज खत्म नहीं हो जाता। उन्हें यह भी तय करना होगा कि उनका वोट ऐसे ईमानदार एवं योग्य प्रत्याशियों के पक्ष में गिरे जिनमें जनसेवा का जज्बा हो। सिर्फ महंगे प्रचार या भावनात्मक ब्लेकमेल से प्रभावित होकर वोट डालना अपने मताधिकार का दुरुपयोग ही है। यदि आप राजनीति को परिष्कृत करना चाहते हैं तो फिर शालीनता की राजनीति के हिमायतियों के पक्ष में ही अपने वोट का इस्तेमाल करें। राजनीति की विकृतियों को दूर करके ही देश-प्रदेश को आगे ले जाया जा सकता है। इसमें एक प्रमुख विकृति पुरुषवादी सोच भी भी है। राज्य एवं केंद्र सरकार ने तमाम तरह के संशोधन कर इस विकृति को दूर करने का प्रयास किया है लेकिन आप भी मतदान के जरिये इसमें अपना योगदान दे सकते हैं। आपको सिर्फ यह करना है कि आप उस प्रत्याशी के पक्ष में अपना वोट डालें जो महिलाओं के प्रति सम्मानजनक नजरिया रखता हो। आपकी यह सोच राजनीति को एक रचनात्मक दिशा मिलने में मददगार होगी। आपसे यही उम्मीद है कि आप लोकतंत्र को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए न केवल अपना वोट डालेंगे बल्कि यह भी सुनिश्चित करेंगे कि आपका वोट सुयोग्य प्रत्याशी के पक्ष में ही पड़े।
-सर्वदमन पाठक

Tuesday, December 8, 2009

चुनावी विकृतियों पर अंकुश जरूरी

मध्यप्रदेश में नगर निकाय चुनाव का प्रचार अभियान अपने अंतिम चरण में है। चाहे मेयर का चुनाव हो या पार्षदों का, स्वाभाविक रूप से इस बार भी पूर्व की तरह ही कांग्रेस एवं भाजपा के बीच ही प्रमुख टक्कर है। कुछ क्षेत्रों में अवश्य ही विद्रोही प्रत्याशी इन दलों के समीकरण को बिगाड़ रहे हैं और इक्का दुक्का स्थानों में बसपा, सपा भी जोर मार रही है, यह अलग बात है कि इनकी यह कोशिश कहां तक रंग लाती है। दरअसल दोनों ही प्रमुख दल कई निर्वाचन क्षेत्रों में गुटबाजी के कारण गलत प्रत्याशियों को मैदान में उतारने का खमियाजा भुगत रहे हैं। सभी दलों में कमोवेश इस पर खासी नाराजी है कि पार्टी के प्रति निष्ठïा एवं सेवाओं को दरकिनार कर ऐसे लोगों को प्रत्याशी बनाया गया है जो कि अयोग्य एवं अक्षम हैं। लेकिन अब तीर कमान से निकल चुका है और असंतुष्टïों को या तो मना लिया गया है या फिर चुनाव में यह कोशिश की जा रही है कि उनके असंतोष का पार्टी की संभावनाओं पर ज्यादा असर न पड़े। अब तो सभी प्रत्याशियों का पूरा जोर इसी बात पर है कि अंतिम चरण के प्रचार मेें मतदाताओं को अपनी खूबियों और प्रतिद्वंदी की खराबियों के बारे में येन केन प्रकारेण आश्वस्त कर दिया जाए और इसके लिए हर उस हथकंडे का इस्तेमाल किया जा रहा है जो परवान चढ़ सकता है। भले ही यह स्थानीय स्तर का चुनाव हो लेकिन इसमें भी वैसा ही माहौल देखा जा रहा है जैसा कि विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में देखा जाता है।इसमें भी बाहुबल और धनबल का प्रभाव साफ देखा जा सकता है। कई चुनाव क्षेत्रों में यह चुनावी जंग किसी जंग की तरह ही लड़ी जा रही है जिसमें सभी कुछ जायज होता है। लोगों को प्रलोभन देकर वोट बंटोरना तो आम बात है। आखिर ऐसे चुनावी वायदे भी तो नाजायज प्रलोभन ही हैं, जिन्हें पूरा किया जाना मुमकिन न हो। चप्पे चप्पे पर प्रचार करते आलीशान वाहन और अचानक उग आई कार्यकर्ताओं की फौज चुनावी सरगर्मी को बखूबी बयां कर सकती है। कई स्थानों पर हिंसा की खबरें सामने आ रही हैं जो चुनावी माहौल में आई विकृति का ही प्रतीक है। इस बात की भी संभावना जताई जा रही है कि चुनाव में फर्जी मतदान की बड़े पैमाने पर कोशिश हो सकती है। फर्जी मतदान दरअसल लोकतंत्र की मूल भावना को क्षति पहुंचाता है क्योंकि इससे कई स्थानों पर वे प्रत्याशी जीत जाते हैं जिन्हें जनता चुनना नहीं चाहती। सरकार यदि चाहती है कि चुनाव जन आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करें तो उसे फर्जी मतदान की किसी भी कोशिश को सख्ती से रोकना चाहिए। इसी तरह से प्रलोभन और बाहुबल के बल पर चुनाव जीतने के मंसूबे बांध बैठे प्रत्याशियों पर भी नकेल कसी जानी चाहिए ताकि ऐन चुनाव के वक्त उन्हें इसका लाभ न मिल सके।चुनावी विकृतियों पर अंकुश लगाने के लिए सबसे अधिक आवश्यक यह है कि मतदाताओं में चेतना आए और वे गलत तरीके अपनाने वाले प्रत्याशियों पर भरोसा न करें और उन्हीं प्रत्याशियों को चुनें जो उनके भरोसे पर खरे उतर सकें क्योंकि सिर्फ सरकार या प्रशासन के बल पर यह लोकतांत्रिक यज्ञ सफल नहीं हो सकता।
-सर्वदमन पाठक

Friday, December 4, 2009


सियासत की गोटियां नहीं हैं गैस पीडित

सन 1984 को 2 एवं 3 दिसंबर की मध्यरात्रि भोपाल के लिये पीड़ा का सैलाब लेकर आई। इस रात को यूनियन कार्बाइड के संयंत्र से रिसी मिक गैस ने राजधानी में ऐसा वायु प्रलय मचाया कि यह झीलों का शहर आहों और आंसुओं की नदी में तब्दील हो गया। उस जानलेवा रात शहर में मौत नाच नाच कर मातम की मुनादी कर रही थी और शहर के तमाम लोग बदहवास से जान बचाने के लिए चारों तरफ भाग रहे थे। इस काली रात की सुबह हुई तो तमाम दुनिया यह जान चुकी थी कि बहुराष्टï्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड ने भोपाल की तकदीर में औद्योगिक त्रासदी के रूप में ऐसी भयावह इबारत लिख दी है कि जिसकी मिसाल दुनिया में नहीं मिलती। शहर के श्मसान एवं कब्रिस्तान भी मौत के आगोश में समाये बदकिस्मत लोगों के अंतिम संस्कार के लिए छोटे पड़ गए और मौत द्वारा फैलाए गए इस जाल से किसी तरह बच निकले लाखों लोगों में से बहुत से लोग आज भी ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं जो मौत से भी बदतर है। गैस त्रासदी की बरसी आते ही इन गैस पीडि़तों के घाव पर मरहम लगाने के नाम पर उन्हें मुआवजे, पुनर्वास तथा मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध कराने जैसे कदमों की जानकारी वाले ब्रोशर जारी कर राज्य सरकारें अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश कर लेती हैं लेकिन यक्ष प्रश्र यह है कि क्या इन गैस पीडि़तों को उनका हक मिल पाया है। इन गैस पीडि़तों को मुआवजा इस अंदाज में बांटा गया है मानो उनके आत्म सम्मान की बोली लगाई जा रही हो। आज भी अस्पतालों की अव्यवस्था इतनी भयावह है कि ये अस्पताल कई बार तो गैस पीडि़तों के यातनागृह नजर आते हैं। गैस प्रभावित बस्तियों में श्वास तथा अन्य कई गंभीर बीमारियों के कारण रेंगती जिंदगियां हर कदम पर देखी जा सकती हैं। अभी कल ही जारी हुई ईएसई की रिपोर्ट के अनुसार यूका कचरे के कारण इन बस्तियों का भूजल भी इतना जहरीला हो गया है कि आने वाली पीढिय़ों पर भी धीमी मौत का खतरा मंडराने लगा है। हम हर साल गैस कांड की बरसी पर मशाल जुलूस निकालकर और जंगी प्रदर्शन करके -डाउन विथ एंडरसन- तथा -मौत के सौदागरों को फांसी दो- जैसे नारे लगाते हैं लेकिन इस मुकदमे का यह आलम है कि गैस कांड के आरोपी मौत के सौदागर आज भी बेखौफ घूम रहे हैं। लोगों की धारणा है कि बहुराष्टï्रीय कंपनियों एवं सत्ता के बीच मिलीभगत भी इस विलंब के लिए जिम्मेदार है। इस मामले में कोई भी सरकार दूध की धुली नहीं रही है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विभिन्न राजनीतिक दल गैस पीडि़तों के नाम पर अपनी वोट बैंक की राजनीति साधने की कोशिश में जुटे हुए हैं। गैस पीडि़तों के ध्वजवाहक होने का दावा करने वाले कुछ संगठन भी जाने-अनजाने इसमें मददगार हो रहे हैं जो गैस पीडि़तों के साथ छल के अलावा कुछ नहीं है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि गैस पीडि़तों के हक की लड़ाई कमजोर पड़ रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि गैस कांड की पच्चीसवीं बरसी पर तो कम से कम सरकार, गैसपीडि़तों के संगठन, राजनीतिक दलों सहित वे तमाम पक्ष, जो खुद को गैसपीडि़तों का मसीहा बताते नहीं थकते, आत्म विश्लेषण एवं आत्मालोचन करेंगे और ईमानदारी से संकल्प करेंगे कि वे तब तक चैन की सांस नहीं लेंगे जब तक कि गैसपीडि़तों को पूरी तरह न्याय नहीं मिल जाता।

-सर्वदमन पाठक

Tuesday, December 1, 2009

आतंकवाद का पैैैशाचिक चेहरा

एक पुलिसकर्मी सहित तीन लोगों को गोलियों से भून डालने की खंडवा में हुई आतंकवादी वारदात प्रदेश में आतंकवाद के पुन: सिर उठाने का संकेत है। सरकार की यह स्वीकारोक्ति भी इसका प्रमाण है कि इस घटना के पीछे आतंकवादी हाथ होने की संभावना है। यदि मीडिया की खबरों पर भरोसा किया जाए तो सिमी के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ का बदला लेने के लिए यह कार्रवाई की गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इस वारदात को अंजाम देने वाला आतंकवादी भाग निकला और उसे अभी तक पकड़ा नहीं जा सका है। यदि कोई आतंकवादी बेगुनाहों की जान लेने के अपने नापाक मंसूबों को सरे बाजार अंजाम देकर फरार होने में सफल हो जाए तो इससे पुलिस सहित समूची सुरक्षा व्यवस्था की क्षमता तो संदेह के दायरे में आती ही है, उन लोगों के मानवीय फर्ज पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है जो घटना के वक्त वहां मौजूद थे और इस घटना के चश्मदीद गवाह थे लेकिन उन्होंने राष्टï्र के इस दुश्मन को पकडऩे का जज्बा नहीं दिखाया। राष्टï्र के प्रति अपनी निष्ठïाएं इतनी कमजोर क्यों होनी चाहिए कि आतंकवाद उस पर भारी पड़ जाए। सवाल यह भी है कि आखिर हमें अपनी सुरक्षा के लिए सिर्फ पुलिस तथा सुरक्षा बलों पर ही आश्रित क्यों रहना चाहिए। राज्य सरकार ने इस घटना के बाद संकल्प व्यक्त किया है कि इसके आरोपी को शीघ्र ही सींखचों के पीछे लाया जायेगा और इसे इसकी करनी की समुचित सजा दिलाई जाएगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घटना के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि राज्य में आतंकवाद को समूल नष्टï किया जाएगा। राज्य सरकार की यह घोषणा कुछ भरोसा अवश्य दिलाती है लेकिन वास्तविकता पर नजर डालें तो यही प्रतीत होता है कि पिछले कुछ सालों में प्रदेश में आतंकवादी गतिविधियां काफी फैलती रही हैं। विशेषत: सिमी की गतिविधियों में कुछ वर्षों से काफी इजाफा हुआ है। मालवा में तो मानो आतंकवाद की फैक्टरी ही चल रही थी। इतना ही नहीं, आतंकवाद की प्रतिक्रियास्वरूप भी यहां एक तरह के उग्रवाद ने सिर उठा लिया था और सरकार इसका खात्मा करने में सफल नहीं रही। आतंकवाद के सफाये के लिए जरूरी है कि शासन प्रशासन इसके लिए पूरी ईमानदारी से अभियान चलाए और वोट बैंक की खातिर किसी भी तरह के आतंकवाद के प्रति नरम रुख न अपनाए। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार आतंकवाद के सफाये के अपने वादे पर खरी उतरेगी और प्रदेश में विकास के लिए जरूरी शांति का वातावरण बनाने में कामयाब होगी।

-सर्वदमन पाठक