Tuesday, December 18, 2012


तोमर का ताज, नए दौर का आगाज

सर्वदमन पाठक

मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद पर नरेंद्र सिंह तोमर की ताजपोशी के साथ ही भाजपा की प्रादेशिक राजनीति में एक बड़ी तब्दीली की इबारत बखूबी लिख दी गई। यह शायद भाजपा में ही संभव था कि इतनी महत्वपूर्ण घटना को बिना किसी विरोध अवरोध के अंजाम दे दिया गया हालांकि इसकी आकस्मिकता से सब चकित जरूर रह गए। प्रदेश की सियासत की नाड़ी पर हाथ रखे रहने का दावा करने वाले पत्रकारों के लिए इसे एक नाकामी ही माना जाएगा कि दो दिन पहले तक उन्हें भी इसकी भनक तक नहीं लगी। इतना ही नहीं, पूर्व पत्रकार और भाजपा के निवर्तमान अध्यक्ष प्रभात झा के लिये भी यह बदलाव किसी अप्रत्याशित घटना जैसा ही आश्चर्यजनक रहा। यदि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कुछ ठान ले तो फिर इसके विरोध की गुंजायश काफी कम होती है इसलिए इस मामले में भी विरोध का कोई सवाल ही नहीं था लेकिन प्रभात झा ने तोमर की ताजपोशी के समय जिस तरह से अपनी वेदना जताई, वह भी चुनाव के तौर तरीके के प्रति उनके विरोध प्रदर्शन का ही एक तरीका था। उन्होंने अपने संबोधन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर जिस तरह से निशाना साधा, उससे उनकी बेचैनी का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता था। उन्होंने इस चुनाव में बरती गई गोपनीयता की तुलना पोखरन परमाणु विस्फोट से कर अपनी नाखुशी का इजहार कर दिया हालांकि उन्होंने नवनिर्वाचित अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की तारीफ कर प्रगट रूप से अपनी भावनाओं में संतुलन लाने का प्रयास भी किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने यह दर्शाने की कोशिश की कि यह संगठन का फैसला था और इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी लेकिन यह वास्तविकता अब सबके सामने है कि शिवराज सिंह ने एक निश्चित रणनीति के तहत खुद ही इस परिवर्तन की पटकथा लिखी थी। बहरहाल इसके परिणामस्वरूप अब प्रदेश भाजपा को तोमर के रूप में एक सक्षम तथा चतुर राजनीतिक व्यूहरचनाकार नेतृत्व मिला है जिसमें अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर वक्त के तकाजों को समझते हुए रणनीति बनाने और उसे अमलीजामा पहनाने की क्षमता है। मुख्यमंत्री के साथ उनके रिश्ते पारस्परिक भरोसे के कितने ऊंचे पायदान पर हैैं, यह उनके चुनाव से ही स्पष्ट हो जाता है। अत: उम्मीद की जा सकती है कि चुनावी तैयारी के इस अहम दौर में सत्ता एवं संगठन के इन दोनों शीर्ष नेतृत्वों के बीच भरपूर तालमेल बना रहेगा। यह पद ग्र्रहण करने के पहले तक तोमर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव थे। इस नाते उनकी भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी सहित तमाम राष्ट्रीय नेताओं से जो फाइन ट्यूनिंग रही है, वह प्रदेश के विभिन्न कार्यक्रमों और नीतियों के साथ  केंद्रीय नेतृत्व के सहयोग और समन्वय में अवश्य ही मददगार होगी।
इसमें कोई शक नहीं है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में प्रभात झा का कार्यकाल भी उपलब्धियों से भरा रहा है। नगरीय निकायों सहित कई चुनावों में भाजपा को विजयश्री दिलाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है लेकिन उनका पार्टी के प्रति उनका ज्यादा बड़ा योगदान यह रहा है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ काफी मुखर रहे हैं। संगठन की विभिन्न बैठकों में तो उन्होंने सरकार को भी भ्रष्टाचार से सचेत करने की कोशिश की है जो संभवत: भाजपा के एक वर्ग को रास नहीं आई। इसके अलावा राजनीति में सबको खुश रखने वाली 'साफ्टनेसÓ की जरूरत होती है लेकिन इसके विपरीत विभिन्न मुद्दों पर 'एरोगेंसÓ की हद तक उनकी आग्र्रही प्रवृत्ति भी लोगों को रास नहीं आई जिसका खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। यदि यह कहा जाए कि स्वाभिमानी पत्रकार का उनका तेवर उनकी सियासत की राह की बाधा बन गया तो गलत नहीं होगा।
कल्पना के कनकौवे उड़ाने में माहिर कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह संदेह जता रहे हैैं कि मुख्यमंत्री के इशारे पर संगठन में शीर्ष स्तर पर फेरबदल का यह सिलसिला कहीं प्रदेश को गुजरात की तर्ज पर तो नहीं ले जाएगा जहां नरेंद्र मोदी के सामने भाजपा संगठन की कोई अहमियत ही नहीं रह गई है लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। शिवराज सिंह काफी 'डाउन टू अर्थÓ हैैं और वे सर्वसमावेशी नेतृत्व में भरोसा रखते हैैं। उनकी हर यात्रा तथा कार्यक्रम में संगठन को पर्याप्त महत्व दिया जाता है। उन्होंने अपने चारों ओर पाखंड की कोई दीवार नहीं बनाई है। यही कारण है कि वे दलीय कार्यकर्ताओं के लिए सहज रूप से सुलभ हैैं। वैसे भी काडर आधारित संगठन होने के नाते भाजपा में व्यष्टि को समष्टि की इकाई के रूप में ही महत्व दिया जाता है। इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों की उक्त धारणा का कोई आधार नहीं है। बहरहाल इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आगामी विधानसभा चुनाव में प्रदेश की सत्ता एवं संगठन के नेतृत्व की मिली जुली रणनीति काफी महत्वपूर्ण रोल अदा करने वाली है जिसकी पृष्ठभूमि इस चुनाव के जरिये तैयार कर ली गई है।

Thursday, December 13, 2012


 अन्नदाता की मौतों पर राजनीति

सर्वदमन पाठक

यह विडंबना ही है कि किसान एक बार फिर राजनीति की बिसात पर मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहा है। मध्यप्रदेश विधानसभा में किसानों की खुदकुशी पर सरकार को घेरने का कांग्र्रेस का प्रयास और सत्ता पक्ष द्वारा इसका प्रतिकार इसी तरह की राजनीति का हिस्सा है। सदन में प्रश्नकाल के दौरान सरकार द्वारा दिया गया जवाब इस राजनीति की वजह बन गया है। इस जवाब में सरकार ने स्वीकार किया है कि राज्य में पिछले आठ माह में 655 किसानों तथा 886 कृषि मजदूरों ने खुदकुशी की है। प्रकारांतर से कहा जाए तो सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में प्रतिदिन आठ किसान और कृषि मजदूर मौत को गले लगा रहे हैैं। विपक्ष का आरोप है कि किसानों के प्रति सरकार की संवेदनहीन नीतियों के कारण वे खुदकुशी करने को मजबूर हो रहे हैैं वहीं सरकार का दावा है कि इनकी खुदकुशी की वजह कृषि संबंधी परेशानियां नहीं हैं, बल्कि वे अन्य कारणों से आत्महत्या कर रहे हैैं। विधानसभाध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी ने किसानों की खुदकुशी को व्यवसाय से न जोड़े जाने की बात की जिसका यही निहितार्थ था कि इस मामले को राजनीति से जुड़ी निर्मम बहस से बाहर निकालने तथा इसे मानवीय पहलू से देखने की जरूरत है लेकिन उनकी इस समझाइश को सत्ता एवं विपक्ष दोनों ने ही अनसुना कर दिया।
यदि तथ्यों के प्रकाश में अन्नदाताओं की मौतों का विश्लेषण किया जाए तो विरोधाभासी दृश्य उभरकर सामने आता है। सरकार ने अपने कार्यकाल में किसानों के हित में कई योजनाएं एवं कार्यक्रम चलाए हैैं। किसानों को ब्याजमुक्त ऋण जैसे कई कार्यक्रम इसके गवाह हैैं। सरकार का दावा है कि पिछली कांग्र्रेस सरकार की तुलना में उसने किसानों को काफी सुविधाएं मुहैया कराई हैैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। राज्य सरकार की योजनाओं का उद्देश्य भले ही किसानों की मदद करना हो लेकिन इनमें जमकर भ्रष्टाचार हुआ है और इसी वजह से इन योजनाओं का लाभ किसानों को समुचित रूप से नहीं मिल पाया है। किसानों के लिए आवंटित भारी भरकम राशि का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्ट अफसरों तथा भ्रष्ट नेताओं की जेब में चला गया और इसका परिणाम यह हुआ कि किसानों पर बदकिस्मती का साया ज्यों का त्यों बना रहा। इतना ही नहीं, फसलों के मौसम में किसानों को कम बिजली मिलने से वे अपेक्षा से काफी कम फसल ही ले सके। नकली बीज और खाद की आपूर्ति में भारी किल्लत ने उनकी परेशानियों को दुगना कर दिया। चूंकि किसानों की पूरी अर्थव्यवस्था कृषि पर ही निर्भर करती है और अच्छी फसलों की आशा में वे कर्ज ले लेते हैैं इसलिए फसलों की बर्बादी से उन पर विपत्ति आना स्वाभाविक ही था। अवसाद की ऐसी ही स्थिति उनकी खुदकुशी का कारण बनी हो, इस संभावना से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता।
यह सही है कि प्रदेश के किसानों में असंतोष की एक लहर सी उठती देखी जा रही है और विपक्ष किसानों के इस असंतोष को भुनाने में जुटा हुआ है। किसानों की खुदकुशी का मुद्दा उछालने के पीछे भी उसकी यही रणनीति काम कर रही है लेकिन राज्य सरकार इस संवेदनशील मामले से जिस संवेदनहीन तरीके से निपटने की कोशिश कर रही है, वह उसके लिए आत्मघाती ही है। किसानों की खुदकुशी की यदि समुचित जांच की जाए तो उसके कारणों का पता लगाया जा सकता है और कृषि संबंधी कारणों से जिन किसानों की मौतों की बात जांच में उजागर होती है उन्हें मुआवजा देकर सरकार कुछ हद तक किसानों की सहानुभूति हासिल कर सकती है। इससे किसान पुत्र मुख्यमंत्री की छवि तो निखरेगी ही, ग्र्रामीण क्षेत्रों में सरकार के पक्ष में वातावरण बनाने में भी मदद मिलेगी। अच्छा यही होगा कि किसानों को राजनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने के बदले सत्ता और विपक्ष उनकी पीड़ाओं पर मरहम लगाने तथा उनकी मुश्किलों को हल करने के लिए मिलजुल कर सार्थक प्रयास करे।

Wednesday, December 5, 2012


असुरक्षित नागरिक और बेखौफ अपराधी


सर्वदमन पाठक

भोपाल के व्यस्ततम इलाकों में से एक स्टेट बैैंक चौराहे के सामने स्थित बिजली दफ्तर में कैश काउंटर पर बैठी महिला की दिन दहाड़े हत्या तथा कैश की लूट इस बात की परिचायक है कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति कितनी भयावह है। दरअसल राज्य सरकार भले ही प्रदेश में अमन चैन के कितने ही दावे करे लेकिन यह हकीकत उससे भी छिपी नहीं है कि राज्य में अपराधियों के हौसले कितने बुलंद हैैं। राज्य को इस असुरक्षा के माहौल में पहुंचाने के लिए राज्य की पुलिस ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जो आए दिनों होने वाली अपराधों की गंभीर वारदातों के बावजूद अकर्मण्यता का लिहाफ ओढ़े रहती है। इस मामले में भी पुलिस का ऐसा ही संवेदनहीन रवैया देखा जा रहा है और संभवत: इसी वजह से पुलिस को अभी तक इस मामले में कोई महत्वपूर्ण सुराग हाथ नहीं लग पाया है। बिजली वितरण कंपनी ने हत्या से शोकाकुल परिवार को दो लाख से ऊपर का मुआवजा तथा मृतका का परिजनों में किसी को नौकरी देने का वादा करके उनके आंसू पोंछने की कोशिश अवश्य की है लेकिन इस हत्या से यह सिद्ध हो गया है कि वहां सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध नहीं थे। सच तो यह है कि अपने कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करने में विद्युत वितरण कंपनी की नाकामयाबी के कारण ही हत्या की यह घटना घटी है। इस घटना से राजधानी की पुलिस की कार्यशैली भी संदेह के कटघरे में आ गई है क्योंकि यह हत्या जिस स्थान पर हुई वह कोहेफिजा थाने से मुश्किल से दो सौ मीटर की दूरी पर है। अपराधी इस वारदात को अंजाम देकर फरार हो गया लेकिन पुलिस को इसकी भनक तक  नहीं लगी। जब पुलिस थाने के अत्यंत ही करीब  स्थित दफ्तर में अपराधी इतनी सनसनीखेज वारदात को अंजाम देकर आराम से बच निकलते हैैं तो फिर अन्य स्थानों की सुरक्षा व्यवस्था कितनी लचर होगी, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है।
पुलिस एवं प्रशासन की लापरवाही की यह कोई अकेली मिसाल नहीं है बल्कि राजधानी सहित संपूर्ण प्रदेश में जघन्य अपराधों की बाढ़ सी आ गई है और पुलिस के चेहरे पर शिकन तक नहीं है। पुलिस केइस निकम्मेपन को लेकर राज्य सरकार की क्षमता पर भी प्रश्न चिन्ह लग रहे हैैं क्योंकि राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है। पुलिस की यह अमानवीय संवेदनहीनता दरअसल कई तरह के संदेह उत्पन्न करती है। पुलिस और अपराधियों की सांठगांठ कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है। इसी वजह से कई बार काफी पुख्ता प्रमाण होने के बावजूद पुलिस संगीन जुर्म के अपराधियों के खिलाफ या तो मामला दर्ज नहीं करती और अगर उसे मजबूरन मामला दर्ज करना भी पड़ा तो इतनी कमजोर धाराएं लगाती है कि अपराधी अदालत से छूट जाते हैैं। इसकेअलावा कई बार राजनीतिक दबाव के चलते पुलिस अपराधियों के खिलाफ मामला दर्ज नहीं कर पाती हालांकि ऐसे मामले सरकार की बदनामी का सबब बनते हैैं।
अपराधों में बेतहाशा इजाफे के कारण राज्य में अमन चैन के सरकार के दावों की असलियत सामने आ गई है। इससे नागरिकों को यह महसूस हो रहा है कि वर्तमान सरकार के राज्य में उनका जीवन सुरक्षित नहीं है। राज्य में तीसरी बार सत्ता सिंहासन हासिल करने की उम्मीद कर रही सरकार के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है। राज्य सरकार यदि अपनी हेट्रिक सुनिश्चित करना चाहती है तो उसे राज्य में शांति एवं सुरक्षा का वातावरण बनाना ही होगा।

Monday, December 3, 2012

ये पब्लिक है, सब जानती है
सर्वदमन पाठक

 हालांकि अभी मध्यप्रदेश विधानसभा के  चुनाव लगभग एक साल दूर हैैं लेकिन लगता है कि प्रदेश में चुनावी मौसम अभी से दस्तक देने लगा है। सियासी दांवपेंचों में आई तेजी इसी वास्तविकता की ओर संकेत कर रही है। चाहे विपक्ष हो या फिर सत्तारूढ़ दल दोनों ही चुनावी रंग में रंगते नजर आ रहे हैैं। मसलन प्रमुख विपक्षी दल कांग्र्रेस ने पिछले चुनाव के बाद पहली बार किसान सम्मेलनों के बहाने विपक्ष के रूप में अपनी सक्रियता का अहसास कराया है। संदेश स्पष्ट है कि कांग्र्रेस किसानों के असंतोष को भुनाने के लिए यह कदम उठाने जा रही है। उधर सरकार को भी यह अहसास है कि किसानों के भीतर घुमड़ रहे असंतोष के चलते चुनावी जंग में उसे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है इसलिए वह भी अपने ढंग से इससे निपटने की रणनीति बनाने में जुट गई है। यह सर्वविदित है कि राज्य में इस समय बिजली और सड़क की समस्या से लोगों विशेषत: किसानों का जीना मुहाल है। बिजली की घोषित-अघोषित कटौती के कारण न केवल खेती किसानी, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में भी किसान बिजली कटौती के झटकों से बेजार हैं। चूंकि खेती पर ही उनकी समूची अर्थव्यवस्था टिकी है, और बिजली कटौती का सर्वाधिक प्रभाव खेती पर पड़ा है, इसलिए उनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही गड़बड़ा गई है। इससे सरकार के प्रति उनकी नाराजगी स्वाभाविक ही है। राज्य मंत्रिमंडल की अनौपचारिक बैठक में मंत्रियों द्वारा इन समस्याओं पर दर्शाई गई बेचैनी इसी का प्रमाण है। भले ही सरकार के पास इसका कोई फौरी हल न हो लेकिन उसने इन मुद्दों पर खुद को निर्दोष बताने तथा पूरा का पूरा दोष केंद्र सरकार के सिर मढऩे की पूरी-पूरी तैयारी कर ली है। इस सिलसिले में राज्य मंत्रिमंडल की अनौपचारिक बैठक में तय किया गया है कि पूरा मंत्रिमंडल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर प्रदेश के साथ किये जा रहे भेदभाव की शिकायत करेगा। सोची समझी रणनीति के तहत राज्य सरकार प्रधानमंत्री से कहेगी कि केंद्र की भेदभावपूर्ण नीतियों के चलते कोयले की अपर्याप्त आपूर्ति के कारण राज्य को पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं हो पा रही है। इसके कारण किसानों को राज्य समुचित मात्रा में बिजली उपलब्ध कराने में खुद को असमर्थ पा रहा है। इसी प्रकार राज्य में सड़कों की बदहाली का ठीकरा भी केंद्र के सिर फोडऩे की तैयारी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने जिस तरह से कैबिनेट की अनौपचारिक बैठक में राष्ट्रीय राजमार्गों की बदहाली के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है, उससे यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि प्रधानमंत्री से मुलाकात में राष्ट्रीय राजमार्गों की बदहाली को भी पुरजोर तरीके से उठाया जाएगा। इस कवायद का उद्देश्य यही है कि राज्य की जनता को यह समझाने की कोशिश की जाए कि राज्य में सड़कों की बदहाली तथा बिजली संकट के लिए केंद्र सरकार ही जिम्मेदार है। वैसे अपने ऊपर मंडराने वाले किसी भी संकट के लिए केंद्र सरकार को उत्तरदायी ठहराना राज्य सरकार का पुराना फंडा है। इसका प्रमाण यही है कि खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह बिजली संयंत्रों को अपर्याप्त कोयला आपूर्ति के खिलाफ धरने पर बैठ चुके हैैं।
लेकिन यक्ष प्रश्न यही है कि राज्य सरकार की इस मासूमियत पर जनता कितना भरोसा करेगी। बहरहाल सरकार एवं विपक्ष को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि अब जनता उनकी चालबाजियों से वाकिफ हो चुकी है और अब लोगों की समस्याओं के हल के ईमानदार प्रयास ही उन्हें संतुष्ट कर सकेंगे, महज शिगूफेबाजी नहीं।
ये पब्लि· है, सब जानती है

सर्वदमन पाठ·

हालां·ि अभी मध्यप्रदेश विधानसभा ·े  चुनाव लगभग ए· साल दूर हैैं ले·िन लगता है ·ि प्रदेश में चुनावी मौसम अभी से दस्त· देने लगा है। सियासी दांवपेंचों में आई तेजी इसी वास्तवि·ता ·ी ओर सं·ेत ·र रही है। चाहे विपक्ष हो या फिर सत्तारूढ़ दल दोनों ही चुनावी रंग में रंगते नजर आ रहे हैैं। मसलन प्रमुख विपक्षी दल ·ांग्र्रेस ने पिछले चुनाव ·े बाद पहली बार ·िसान सम्मेलनों ·े बहाने विपक्ष ·े रूप में अपनी स·्रियता ·ा अहसास ·राया है। संदेश स्पष्ट है ·ि ·ांग्र्रेस ·िसानों ·े असंतोष ·ो भुनाने ·े लिए यह ·दम उठाने जा रही है। उधर सर·ार ·ो भी यह अहसास है ·ि ·िसानों ·े भीतर घुमड़ रहे असंतोष ·े चलते चुनावी जंग में उसे ·ाफी मुश्·िलों ·ा सामना ·रना पड़ स·ता है इसलिए वह भी अपने ढंग से इससे निपटने ·ी रणनीति बनाने में जुट गई है। यह सर्वविदित है ·ि राज्य में इस समय बिजली और सड़· ·ी समस्या से लोगों विशेषत: ·िसानों ·ा जीना मुहाल है। बिजली ·ी घोषित-अघोषित ·टौती ·े ·ारण न ·ेवल खेती ·िसानी, बल्·ि रोजमर्रा ·ी जिंदगी में भी ·िसान बिजली ·टौती ·े झट·ों से बेजार हैं। चूं·ि खेती पर ही उन·ी समूची अर्थव्यवस्था टि·ी है, और बिजली ·टौती ·ा सर्वाधि· प्रभाव खेती पर पड़ा है, इसलिए उन·ी पूरी अर्थव्यवस्था ही गड़बड़ा गई है। इससे सर·ार ·े प्रति उन·ी नाराजगी स्वाभावि· ही है। राज्य मंत्रिमंडल ·ी अनौपचारि· बैठ· में मंत्रियों द्वारा इन समस्याओं पर दर्शाई गई बेचैनी इसी ·ा प्रमाण है। भले ही सर·ार ·े पास इस·ा ·ोई फौरी हल न हो ले·िन उसने इन मुद्दों पर खुद ·ो निर्दोष बताने तथा पूरा ·ा पूरा दोष ·ेंद्र सर·ार ·े सिर मढऩे ·ी पूरी-पूरी तैयारी ·र ली है। इस सिलसिले में राज्य मंत्रिमंडल ·ी अनौपचारि· बैठ· में तय ·िया गया है ·ि पूरा मंत्रिमंडल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुला·ात ·र प्रदेश ·े साथ ·िये जा रहे भेदभाव ·ी शि·ायत ·रेगा। सोची समझी रणनीति ·े तहत राज्य सर·ार प्रधानमंत्री से ·हेगी ·ि ·ेंद्र ·ी भेदभावपूर्ण नीतियों ·े चलते ·ोयले ·ी अपर्याप्त आपूर्ति ·े ·ारण राज्य ·ो पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं हो पा रही है। इस·े ·ारण ·िसानों ·ो राज्य समुचित मात्रा में बिजली उपलब्ध ·राने में खुद ·ो असमर्थ पा रहा है। इसी प्र·ार राज्य में सड़·ों ·ी बदहाली ·ा ठी·रा भी ·ेंद्र ·े सिर फोडऩे ·ी तैयारी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने जिस तरह से ·ैबिनेट ·ी अनौपचारि· बैठ· में राष्ट्रीय राजमार्गों ·ी बदहाली ·े लिए ·ेंद्र सर·ार ·ो जिम्मेदार ठहराया है, उससे यह अनुमान लगाना ·ठिन नहीं है ·ि प्रधानमंत्री से मुला·ात में राष्ट्रीय राजमार्गों ·ी बदहाली ·ो भी पुरजोर तरी·े से उठाया जाएगा। इस ·वायद ·ा उद्देश्य यही है ·ि राज्य ·ी जनता ·ो यह समझाने ·ी ·ोशिश ·ी जाए ·ि राज्य में सड़·ों ·ी बदहाली तथा बिजली सं·ट ·े लिए ·ेंद्र सर·ार ही जिम्मेदार है। वैसे अपने ऊपर मंडराने वाले ·िसी भी सं·ट ·े लिए ·ेंद्र सर·ार ·ो उत्तरदायी ठहराना राज्य सर·ार ·ा पुराना फंडा है। इस·ा प्रमाण यही है ·ि खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह बिजली संयंत्रों ·ो अपर्याप्त ·ोयला आपूर्ति ·े खिलाफ धरने पर बैठ चु·े हैैं।
ले·िन यक्ष प्रश्न यही है ·ि राज्य सर·ार ·ी इस मासूमियत पर जनता ·ितना भरोसा ·रेगी। बहरहाल सर·ार एवं विपक्ष ·ो यह भलीभांति समझ लेना चाहिए ·ि अब जनता उन·ी चालबाजियों से वा·िफ हो चु·ी है और अब लोगों ·ी समस्याओं ·े हल ·े ईमानदार प्रयास ही उन्हें संतुष्ट ·र स·ेंगे, महज शिगूफेबाजी नहीं।
टूटती देह की बंदिशें
सर्वदमन पाठक

भारतीय समाज बहुत तेजी से बदल रहा है। उतनी ही तेजी से समाज के  मूल्य भी बदल रहे हैैं। हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी कामयाबी का परचम लहरा रही हैैं और पुरुषों को क्षमताओं के मामले में चुनौती दे रही हैैं। शिक्षा, नौकरी तथा अन्य व्यवसाय में उनकी बढ़ती मौजूदगी इसका प्रमाण है। उन क्षेत्रों में भी, जिन पर कभी पुरुषों का एकाधिकार था, अब महिलाओं का खासा दखल देखा जा सकता है। इसका स्वाभाविक परिणाम यह है कि महिलाओं और पुरुषों के बीच की दूरियां नजदीकियों में बदल रही हैैं। हर महानगर तथा महानगर में तब्दील हो रहे शहरों में शिक्षण संस्थाओं तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में अध्ययन, नौकरी या व्यवसाय करने वाले युवक-युवतियों तथा स्त्री-पुरुषों के लिए समाज एवं परिवार की नैतिकता से जुड़ी बंदिशों तथा परंपराओं का बंधन बेमानी हो चला है। यदि और स्पष्ट तरीके से कहा जाए तो वर्तमान दौर में एक नई संस्कृति करवट ले रही है जहां देह की वर्जनाएं टूट रही हैैं। स्त्री पुरुषों के बीच बढ़ती नजदीकियां सिर्फ  दैहिक हों, यह जरूरी नहीं है। उनमें भावनात्मक प्रगाढ़ता भी हो सकती है लेकिन अंतत: देह का आकर्षण ही उनके भावनात्मक लगाव की अभिव्यक्ति के लिए उत्प्रेरक का काम करता है। पुरुषों एवं स्त्रियों के बीच यौन आकर्षण एक स्वाभाविक सी बात है और जब उन्हें अपने घर-परिवार से दूर स्वछंद वातावरण मिल जाए तो यह यौन आकर्षण सीमाओं का अतिक्रमण करने को बेताब उठता है और फिर भावनाओं का प्रवाह एवं दैहिक जरूरतों को पूरा करने की मजबूरी उनके दैहिक संबंधों का बहाना बन जाती है। न केवल दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता जैसे महानगर बल्कि भोपाल जैसे बड़े शहरों में भी होटलों, पार्कों एवं एकांत स्थलों में अक्सर देखा जाने वाला एक दूसरे में समाने की कोशिश करता आलिंगनबद्ध जोडों का हुजूम इसी हकीकत को दर्शाता है। वर्जनाहीन संस्कृति का यह परिदृश्य समाज के ठेकेदारों के लिए चिंता का विषय हो सकता है लेकिन यह आज की सामाजिक हकीकत है, इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
सवाल यह है कि आखिर इस नई संस्कृति के कारण क्या हैैं और क्या इसे विकृति कहना उचित है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कई बार महिलाओं को अपनी महत्वाकांक्षाओं की कीमत चुकानी पड़ती है। विशेषत: फिल्मों तथा टीवी तथा फैशन शो जैसे शो बिजनेस में काम करने वाली महिलाओं को तो कई बार सफलता की कीमत लोगों को दैहिक दृष्टि से उपकृत करके चुकानी पड़ती है। लेकिन साथ ही महिलाओं में भी यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है कि यदि देह की कीमत पर भी उन्हें सफलता मिले तो उन्हें इसमें कोई आपत्ति नहीं होती। स्वेच्छा से देह का सौदा कर सफलता का शार्टकट अपनाना निश्चित ही एक विकृति कही जा सकती है।
आम तौर पर देखा गया है कि सहकर्मियों तथा सहपाठियों में एक दूसरे के साथ ज्यादा संबंध गुजारने के कारण अंतरंग संबंध विकसित हो जाते हैैं और वे कालांतर में यौन संबंध में तब्दील हो जाते हैैं। महानगरों में तो लिव इन कल्चर भी तेजी से पनप रहा है जिसमें बिना वैवाहिक संबंध के बिना ही पुरुष-स्त्री साथ में रहते हैैं और उनमें सेक्स के संबंध भी होते हैैं। आजकल तो इसे कानूनी मान्यता भी मिल गई है। कई देशों में यह चलन पहले से ही चल रहा है लेकिन हमारे देश में भी अब समाज इसे स्वीकारने लगा है। यह एक तरह का सेक्स का नशा है जिसमें विवाह तथा उससे जुड़ी हुई जिम्मेदारियों से मुक्त रहकर व्यक्ति डूब सकता है।
हो सकता है कि वर्तमान दौर में परिजनों तथा अपने जन्म स्थल से दूर रहने के कारण इन तरीकों से युवक युवतियों की दैहिक तथा भावनात्मक जरूरतें पूरी करने में ये तरीके मददगार सिद्ध होते हों लेकिन सवाल यही है कि क्या इससे विवाह पर आधारित हमारे सामाजिक ढांचा क्षतिग्र्रस्त नहीं होगा और हम धीरे धीरे वर्जनाहीन समाज में तब्दील तो नहीं हो जाएंगे। यदि ऐसा हुआ तो यह भारतीय संस्कृति के क्षरण का ही संकेत होगा।
बॉक्स में
वर्जन
जरूरी नहीं है
माना कि समाज के अपने नियम हैं लेकिन सारे नियमों को स्वीकार करना किसी के लिए भी जरूरी नहीं है। फिर जिंदगी हमारी है तो इसे हमें अपनी मर्जी से जीने का पूरा अधिकार मिलना ही चाहिए।
तान्या सबरवाल
बी कॉम, प्रथम वर्ष
एक्सीलेंस कॉलेज

- सारी जिंदगी रहता है
वर्जनाओं को तोड़कर आगे बढऩे वाले युवाओं को कुछ देर का सुख चाहे मिल जाए लेकिन इसके बदले भविष्य में जो भयावह परिणाम सामने आते हैं, उनका असर सारी जिंदगी रहता है। हवा में उडऩे वाले युवाओं को अपनी सोच बदलकर सामाजिक दायरे में रहना सीखना चाहिए।
विजय प्रताप सिंह
बीई तृतीय वर्ष, मैनिट

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बदलाव अस्थायी है
समाज में लगातार बदलाव हो रहे हैं। इन बदलावों का परिणाम ही है कि आज के युवाओं की सोच बदली है। वे पुराने नियमों का पालन करने में विश्वास नहीं करते। जो नयापन उनकी सोच में देखने को मिल रहा है, वह पानी में उठती तरंगों की तरह है जो कुछ समय के लिए उठती हैं और फिर शांत हो जाती हैं। इसी तरह ये बदलाव भी अस्थायी है।
समाजशास्त्री
ज्ञानेंद्र गौतम
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पश्चिमी देशों की नकल है
हमारे देश में पश्चिमी सभ्यता की नकल करने वाले युवाओं की संख्या अधिक है। वे वहां की हर बात की नकल करना चाहते हैं। पश्चिमी देशों की देखादेखी शादी से पहले सेक्स को वे बुरा नहीं मानते। आज के युवाओं को हर चीज जल्दी पा लेने की आदत हो गई है। वे चाहते हैं कि जो भी चीज वो चाहते हैं, वह फौरन उन्हें मिल जाए इसीलिए नई-नई गर्लफ्रेंड बनाने की इच्छा या सेक्स की चाहत भी वे फौरन पूरा कर लेने में विश्वास रखते हैं। इन आदतों की वजह से ही रिश्ते जितनी जल्दी बनते हैं उतनी ही जल्दी खत्म भी हो जाते हैं।
मनोवैज्ञानिक चिकित्सक
डॉ. काकोली राय

Tuesday, November 2, 2010

.... तभी बन स·ेगा स्वर्णिम मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश इन दिनों अपना 55 वां स्थापना दिवस मना रहा है। यह पहला अवसर है जब पूरे ए· माह त· स्थापना दिवस ·ा जश्न समूचे प्रदेश में मनाया जाएगा। यह वास्तव में ए· गौरवमय अहसास है इसलिए इस·ा औचित्य स्वयंसिद्ध है ले·िन इस·े साथ ही प्रदेश ·े विघटन से उपजी पीड़ा और टीस भी जुड़ी है। दरअसल सन 1956 में हमें प्रदेश ·ी स्थापना ·े साथ ही प्रा·ृति· संपदा ·ा ऐसा खजाना मिला था जिसे देख·र अन्य राज्यों ·ो हमसे ईष्र्या होना स्वाभावि· था ले·िन राज्य ·े विघटन ने ए· झट·े में इस प्रा·ृति· संपदा ·ेए· बड़े हिस्से ·ो हमसे जुदा ·र दिया। इस·े साथ ही हमारी आय ·ा बड़ा स्रोत छत्तीसगढ़ में चला गया और शुरुआती रूप से हमें भारी आर्थि· सं·ट ·ा सामना ·रना पड़ा। उस समय चला आर्थि· बचत ·ा महाअभियान इस ह·ी·त ·ो दर्शाने ·े लिए ·ाफी है। छत्तीसगढ़ ·े रूप में अलग राज्य ·ा गठन ए· राजनीति· फैसला था। राजनीति ·ी इस शतरंज में हो स·ता है ·ि ·िसी दल ·ो फायदा और ·िसी दल ·ो नु·सान हुआ हो ले·िन इस·ी बिसात पर मध्यप्रदेश ·ो ·ाफी ·ुछ खोना पड़ा। बहरहाल अब हम इस झट·े से उबरने ·ा भरपूर प्रयास ·र रहे हैैं और वि·ास ·े ऐसे ·ीर्तिमान गढऩे ·ी ·ोशिश ·र रहे हैैं जो हमारे प्रदेश ·ो स्वर्णिम प्रदेश बना स·ें। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सामान्य सोच से हट·र निश्चित ही ऐसा ·ुछ ·र रहे हैैं जो सामाजि· सरो·ार से संबंधित है और लोगों ·ो मन ·ी खुशहाली देता है। ·न्यादान योजना, लाड़ली लक्ष्मी योजना, जननी सुरक्षा योजना सहित ·ई योजनाएं समाज ·ो ऐसे ही भावनात्म· धरातल पर प्रभावित ·रती हंै। मध्यान्ह भोजन योजना भी इसी ·्रम मेंं रखी जा स·ती है ले·िन सिर्फ भावनात्म· खुशी ·ी इन ·ोशिशों से प्रदेश ·ी त·दीर बदलने वाली नहीं है। इस·े लिए वि·ास ·े ·ुछ ठोस ·दम जरूर उठाने होंगे। हाल में खजुराहो में हुआ इंवेस्टर्स समिट इस दिशा में ए· अच्छा महत्वा·ांक्षी ·दम माना जा स·ता है। दरअसल यह शिवराज सिंह सर·ार द्वारा चलाए जा रहे उद्योगपतियों ·े सम्मेलनों ·े सिलसिले ·ा ही ए· हिस्सा है। सर·ार ·ा दावा है ·ि इस समिट ·े जरिये मध्यप्रदेश देश ·े बड़े उद्योगपतियों ·ो राज्य में उद्योगों ·ी स्थापना ·े लिए आ·र्षित ·रने में सफल रहा है। इसमें जो अनुबंध पत्र हस्ताक्षरित हुए हैैं, उससे तो यही अहसास होता है। ले·िन जरूरत इस बात ·ी है ·ि फालोअप एक्शन भी उतना ही प्रभावी हो। तभी राज्य में बड़े पैमाने पर औद्योगि· वि·ास ·ी राज्य सर·ार ·ा ·ल्पना सफल हो स·ेगी। राज्य सर·ार उद्योगपतियों ·े पिछले सम्मेलनों ·े बाद भी ऐसे ही दावे ·रती रही है ले·िन ·ितने एमओयू उद्योगों ·े रूप में धरातल पर उतरे, यह ·ोई छिपी हुई बात नहीं है। राज्य सर·ार ·ो भी इस·ा आभास है, इसीलिए वह सफाई दे रही है ·ि इस बात ज्यादा सतर्·ता बरती गई है। वैेसे उद्योगों ·ी स्थापना ·े लिए समुचित बिजली तथा अच्छी सड़·ें सबसे बड़ी जरूरत है। अच्छा हो ·ि राज्य बिजली ·ी आत्मनिर्भरता ·े क्षेत्र में तेजी से ·ाम ·रे और इस उद्देश्य ·ो यथाशीघ्र प्राप्त ·रे। इसी तरह ऊबड़-खाबड़ सड़·ों ·े ·लं· ·ो भी प्रदेश ·े माथे से मिटाने ·े लिए उसे सं·ल्पबद्ध प्रयास ·रने होंगे। गौरतलब है ·ि पिछली ·ांग्र्रेस सर·ार ·ी हार में बिजली और सड़· ·े मुद्दे ने बड़ा रोल अदा ·िया था। पानी ·ी उपलब्धता तो वैसे प्र·ृति ·ी मेहरबानी पर ज्यादा निर्भर होती है ले·िन जलाभिषे· जैसे अभियान ·ो राज्य सर·ार ·ो नए सिरे से गति देनी होगी ता·ि पानी ·े सं·ट ·ी स्थिति ·ो यथासंभव दूर ·िया जा स·े। उम्मीद ·ी जानी चाहिए ·ि राज्य सर·ार इन सभी महत्वपूर्ण ·ार·ों ·ी तरफ पूरी पूरी तवज्जो देगी और प्रदेश ·े सभी क्षेत्रों में समान रूप से औद्योगि· विस्तार ·र राज्य में स्थायी खुशहाली ·ी नींव रखेगी और तब हम सही मायने में स्वर्णिम मध्यप्रदेश ·ी मंजिल ·ी ओर तेज ·दमों से आगे बढ़ेंगे।स्थापना दिवस समारोह में सबसे अच्छी बात यह हुई है ·ि इसमें सभी राजनीति· दलों ने अपने राजनीति· भेदभाव तथा मनोमालिन्य ·ो परे रख·र शिर·त ·ी और प्रदेश ·े वि·ास ·े लि सं·ल्प लिया। राज्य सर·ार ·ो प्रदेश ·े हित में इस राजनीति· ए·जुटता ·ो बनाए रखना होगा और आरोप प्रत्यारोपों ·ी राजनीति ·ो त्याग·र स्वर्णिम मध्यप्रदेश ·े निर्माण ·े इस अभियान मेंं सभी राजनीति· दलों ·ी साझीदारी सुनिश्चित ·रनी होगी।
-सर्वदमन पाठ·