Thursday, January 16, 2020

यंग इंडिया की मेगास्टार है दीपिका

यह ऐसा विरला ही सप्ताह रहा जब विश्व की दो अलग अलग जगह की ग्लेमर से भरपूर दो हस्तियां सुर्खियों में छाई रहीं और इससे हंगामा भी हुआ। इन हस्तियों के कार्यकलाप को लेकर परस्पर विरोधी नजरिये की बाढ़ सी आ गई। दीपिका ने जेएनयू की विरोध प्रदर्शन रैली में पहुंचकर हड़ताली छात्रों के समर्थन का संकेत दिया जो बॉलीवुड की खामोश ब्रिगेड के अनुसार बिना सोच विचार के उठाया गया कदम था। दीपिका ने सिर झुकाकर तथा हाथ जोडक़र जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष के प्रति काफी सम्मान प्रदर्शित किया। उस समय आइशी के सिर पर पट्टी बंधी हुई थी और फ्रेक्चर हुए हाथ में पïट्टा चढ़ा हुआ था।  उन्हें केंपस के अंदर नकाबपोश गुंडों ने बुरी तरह पीटा था और वे छात्र विद्रोह का चेहरा बनकर उभरी हैैं। इन दो महिलाओं की मुलाकात की फोटो प्रत्येक बड़े समाचार पत्र में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुई हैं।
उधर हजारों मील दूर ससेक्स की डचेस मेगन मार्कल ने ऐसा कुछ किया कि लोग स्तब्ध रह गए। उन्होंने अपने पति प्रिंस हैरी के साथ रॉयल ड्यूटीज से खुद को हटा लेने की घोषणा की जिस पर उनके कदम में छिपी मंशाओं को लेकर मेल्स का तूफान आ गया। इस पर टिप्पणी करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति खुद को अधिकृत मान रहा था। इन दोनों के पतियों ने भी इन महिलाओं का जबर्दस्त समर्थन किया। रणबीर सिंह ने दीपिका की प्रशंसा एवं प्यार की ऐसी भावुकतापूर्ण पोस्ट भेजी कि अनगिनत पत्नियां ‘आह’ भरकर रह गईं। उन्होंने अपनी सुपरस्टार पत्नी द्वारा किये गए कार्य को सही ठहराते हुए तथा उसके विश्वास के साथ दृढ़ता से खड़े रहते हुए उस पर गर्व प्रदर्शित किया। उधर मेगन को प्रिंस द्वारा दिये गए हीरो जैसे समर्थन ने यह प्रमाणित कर दिया कि ब्रिटिश राजगद्दी के छठवीं पीढ़ी के वंशज इस प्रिंस के पास फौलादी संकल्पशक्ति है। अलबत्ता यह निर्णय उन दोनों का था और इस दंपति का कहना था कि अपने पुत्र के हितों को देखते हुए उन्होंने यह फैसला किया है। लेकिन इसके लिए प्रिंस को अपनी 93 वर्षीय ग्र्रेंडमदर का गुस्सा झेलना पड़ेगा क्योंकि आखिरकार वे इंग्लैैंड की महारानी हैैं।
कहा जा रहा है कि दीपिका द्वारा प्रसिद्धि तथा व्यक्तिगत उपलब्धि के लिए जेएनयू मुद्दे का राजनीतिकरण किया जा रहा है। मैैं इस राय से सहमत नहीं हूं। राजनीति में बॉलीवुड के लोगों की हिस्सेदारी हमेशा ही रही है। यदि आप इसमें शामिल होंगे तो भी आलोचना होगी और नहीं होंगे तो भी आलोचना होगी। इसमें इस बात का कोई मतलब नहीं है कि दीपिका ने अपनी नवीनतम फिल्म के प्रचार के लिए इसे पब्लिसिटी स्टंट के तौर पर इस्तेमाल किया। उसे यह अच्छी तरह मालूम था कि जेएनयू रैली में उसकी उपस्थिति आकर्षण का कारण बनेगी। मुद्दा यह है कि उसने इसका साहस किया जबकि अन्य किसी फिल्मी हस्ती ने ऐसा नहीं किया। उसने इसका जोखिम उठाया और उसकी उपस्थिति ने कई प्रसिद्ध लोगों के घंटों चले भाषण की तुलना में कहीं ज्यादा असर डाला। दीपिका ने  एक स्टैैंड लिया। इसके लिए गट्स चाहिए। उसका यह फैसला प्रतिगामी असर भी डाल सकता था और उसे इससे हानि हो सकती थी। इसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया शुरू भी हो गई है। उसे सरकार के ‘स्किल इंडिया’ वीडियो से हटाया जा चुका है। यह भी केवल शुरुआत है लेकिन उसने छात्रों के साथ खड़े होने का रास्ता चुना और उससे यह कोई भी नहीं छीन सकता।
यह बहुत कठोर और गलत तरीका है कि सेलेब्रिटीज को राजनीतिक मामलों में इस्तेमाल किया जाए या उन्हें सामाजिक जिम्मेदारियों के मामले में लेक्चर पिलाया जाए। हम सब वही करते हैैं जो हमारी अंतरात्मा कहती है।
सिनेमा के दर्शकों में भारी संख्या में छात्र तथा करोड़ों मजदूर वर्ग के लोग शामिल हैैं। बॉलीवुड की नई पीढ़ी के कलाकारों ने इस बात को समझ लिया है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वरुण धवन, रिचा चड्ढ़ा तथा कई अन्य बॉलीवुड स्टार्स ने जेएनयू के प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है। यह स्मार्ट थिंकिंग है। दीपिका युवा भारत की नजर में बहुत बड़ी अभिनेत्री है। कई साल बाद जब इस ऐतिहासिक जेएनयू  रैली का जिक्र होगा, दीपिका की इसमें हिस्सेदारी इसके नैरेटिव का अहम हिस्सा होगी। मेरा विश्वास कीजिए कि कोई भी व्यक्ति इसका स्मरण या परवाह नहीं करेगा कि बॉलीवुड़ के किस मेगा स्टार ने इसमें हिस्सा नहीं लिया या चुप्पी साध ली।
सर्वदमन पाठक

Tuesday, September 3, 2019

हम जिंदगी का फिल्मीकरण क्यों चाहते हैैं?


हमारी जिंदगी विशाल फिल्मी सेट की तरह है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि वह फिल्म स्टार बन जाए। बताइये कि क्या मेरा कहना गलत है। मैैंने एक विवाह-पूर्व बनाया गया विवादास्पद वीडियो देखा जिसमें राजस्थान का एक पुलिसकर्मी और उसकी साथी महिला भद्दे आचरण में मशगूल थे और यह सब बाकायदा फिल्माया जा रहा था। यह वीडियो, जिससे धनपत नामक उक्त पुलिसकर्मी की नौकरी भी जा सकती है, अब हटा दिया गया है। क्या आप जानते हैैं कि यह वीडियो किस सिलसिले में था? हम यही कह सकते हैैं कि यह वीडियो बॉलीवुड की स्किप्ट का बहुत ही गलत प्रस्तुतीकरण था। उदयपुर में इस वीडियो के एक शॉट में एक स्मार्ट तथा अच्छा दिखने वाला ट्रैफिक पुलिसकर्मी(धनपत) दबंग के सलमान खान की तरह व्यवहार करता है। टूव्हीलर पर सवार एक युवती को हेल्मेट न पहनने के कारण वह रोकता है और वह आकर्षक युवती(उक्त पुलिसकर्मी की होने वाली वधू) जुर्माना देने के बदले पुलिसकर्मी के बिल्कुल नजदीक आती है और उसकी शर्ट की जेब में रिश्वत रख देती है। उक्त युवती दिलकश अंदाज में पर्स पकड़े हुए अपने टूव्हीलर पर वहां से रवाना हो जाती है। अगला दृश्य एक कॉफी शॉप का है जहां फ्लर्ट किये जाने के नए नए विजुअल्स दिखते हैैं। ये सीन और अधिक अंतरंग हैैं। यह वीडियो पेशेवर लोगों द्वारा शूट किये गए हैैं जिसमें उक्त पुलिसकर्मी की प्यार की कहानी की स्किप्ट किसी मिनी मूवी की तरह ही दिखती है। उनकी लव स्टोरी इसके आखिरी शॉट पर ही खत्म नहीं होती। इस पुलिसकर्मी के वरिष्ठ अफसर इस वीडियो से नाराज हो उठे हैैं। वे पुलिस की वर्दी के 'दुरुपयोगÓ और इसमें दिखाई गई पुलिस विभाग की नकारात्मक छवि से नाराज हैैं। इस संबंध में पुलिसकर्मी को नोटिस दे दिया गया है और उदयपुर के एसपी कैलाश चंद्र विश्नोई नियमों की छानबीन कर रहे हैैं ताकि पुलिसकर्मी पर कोई कार्रवाई की जा सके।
आजकल वैडिंग वीडियो का व्यवसाय काफी बढ़ गया है और ये व्यावसायिक दृष्टि से बड़े पैमाने पर तथा महत्वाकांक्षी तरीके से तैयार किये जाते हैैं। एक युवा ज्वैलर ने मुझे बताया कि उसने अपनी वैडिंग को बड़े ग्र्रेंड पैमाने पर मनाने की योजना बनाई थी। मैैं यह जानकर आश्चर्यचकित हो गई कि अन्य चीजों के अलावा कई वीडियो के लिए भी एक राशि रखी गई थी जिसमें कथित 'ग्र्रेंड शादीÓ के अश्लील वीडियो तैयार किये जाने थे। वे और उनकी मंगेतर पांच दिन की इस शादी की रस्मों की अपेक्षा इन वीडियो को लेकर काफी उत्सुक थे। वीडियो का फोकस विजुअल्स पर ही था जिन्हें वे शादी की रस्में पूरी होने के पहले ही सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए उतावले हुए जा रहे थे। इन क्लिप्स को अपलोड करने के लिए उन्होंने बाकायदा एक छोटी टीम नियुक्त की थी। बाद में स्वागत समारोह के फुटेज भी पूरी शिद्दत के साथ सोशल मीडिया पर अपलोड किये गए।
आजकल विवाह समारोहों में पांच कैमरों तथा कई द्रोन का सेट लगाना सामान्य हो गया है जिसमें हर रस्म के लिए स्टाइलिंग, मेक-अप तथा वार्डरोब के बदलाव को कई पेशेवर लोगों द्वारा कोरियोग्र्राफ किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इसे एक डायरेक्टर इंचार्ज द्वारा सादगी भरा जादू बिखेरने के लिए नियंत्रित किया जाता है। ऐसा लगता है कि प्र्त्येक परिवार आजकल मल्टी स्टार कॉस्ट तथा धूमधड़ाके भरी शादी चाहता है। यदि आप मेंहदी में बॉलीवुड स्टार्स के डांस का खर्च नहीं उठा सकते तो आप खुद उनके जैसे वस्त्र पहन सकते हैैं और उनकी नकल कर सकते हैैं। बुजुर्गों को भी कैमरे के सामने वर वधू को आशीर्वाद के रटे रटाए डॉयलाग बुलवा दिये जाते हैैं। पवित्र फेरों तक के रीटेक की अनुमति इसमें रहती है।
संपूर्ण भारत में बॉलीवुड का यह असर देखने को मिल सकता है। सामाजिक स्तर पर करोड़पतियों से लेकर, किसान, व्यापारी, बिल्डर तथा बैैंकर्स तक हर कोई इससे प्रभावित है। प्रत्येक व्यक्ति बॉलीवुड स्टाइल की वैडिंग के पीछे दीवाना है। हमने बिना सोचे समझे बॉलीवुड की शक्तिशाली छवि तथा संदेश के सामने समर्पण कर दिया है। इसमें धार्मिक समारोह भी शामिल हैैं।
इस बीच मैैं उम्मीद कर रही हूं कि धनपत को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कठोर चेतावनी देकर छोड़ देंगे। हमारे पुलिस बल में भ्रष्टाचार की वास्तविकता ट्रेफिक पुलिसकर्मी की जेब में उक्त युवती द्वारा डाली गई थोड़ी सी राशि के अनौचित्य की तुलना में काफी भयावह है।
सर्वदमन पाठक

बॉलीवुड-राजनीति ने बाजारीकरण के सामने समर्पण किया

खाने का फैशन से क्या लेना देना है या बॉलीवुड का राजनीति से क्या संबंध है अथवा खेल का इन चारों से क्या संबंध है? काफी कुछ। मुझे इस बात पर विचार करने का ख्याल तब आया जब फैशन वीक( जिसे चलते हुए 20 साल हो चुके हैैं) चल रहा था। दो दशक पहले जब एफडीसीआई के गठन के साथ ही देसी फैशन का कारपोरेट स्वरूप आया तो बड़े खिलाड़ी इसमें कूद पड़े। लगभग रातों रात भारत के अव्यवस्थित तथा असंगठित फैशन उद्योग ने तेजी पकड़ ली और आधुनिक सिस्टम ले आए। डिजाइनर्स, फोटोग्र्राफर्स तथा कोरियोग्र्राफर्स के बीच पुरानी अनौपचारिकता तथा रिश्ते खत्म हो गए। फैशन से संबंधित प्रत्येक मुद्दे पर शार्प ऑपरेटर्स सक्रिय होने लगे। उनका दावा था कि वे फैशन के हित में ही काम कर रहे हैैं। इसका एक सकारात्मक पक्ष था तो नकारात्मक पक्ष भी था। धन ने रचनात्मकता को चलन से बाहर कर दिया लेकिन प्रत्येक चीज-सेट, संगीत तथा संपूर्ण प्रस्तुतीकरण में दर्शनीय रूप से उछाल आया। लेकिन क्या अधिक वस्त्र बिकने लगे? क्या भारत में फैशन की मार्केटिंग का विश्वस्तरीय मॉडल भारत में काम करता है? यह तो ईश्वर ही जानता है। उबाऊ फैशन निश्चित ही चलने लगा लेकिन कमोवेश पहले वाले डिजाइनर्स के साथ शो चलता रहा और पुराने लोगों को पुराना फैशन दिखाया जाता रहा। मेरी राय के मुताबिक तो इस दौरान युवा तथा संकल्पबद्ध फैशन डिजाइनर्स के रूप में नई प्रतिभाएं उत्तरपूर्व से आईं। उनके कलेक्शन्स में ताजगी थी तथा दुहराव नहीं था। उनकी दृष्टि का समर्थन देने वाली सांस्कृतिक आथेंटिसिटी भी उनके कलेक्शन में मौजूद थी। इसका उदाहरण 20 साल के लद्दाखी डिजाइनर स्टान्जिन पाल्मो का काम है।  

उक्त सभी फील्ड में एक बात समान है-चतुराई भरी ब्रांडिंग, प्रस्तुतीकरण का तरीका और मार्केटिंग। पीआर के लिए यह अच्छा समय है क्योंकि बिना तेज तर्रार पीआर टीम के प्रचार कार्य के कुछ भी आगे नहीं बढ़ सकता। फैशन की तरह ही बॉलीवुड भी बदल गया है। यह तभी संभव हुआ जब बड़ी ब्लॉकबस्टर को 'स्वच्छ धनÓ की आर्थिक मदद मिली। 

आज पूरी प्रक्रिया निश्चित तथा पारदर्शी हो गई है जहां स्मार्ट बच्चे भी बड़ी धनराशि की न केवल बात कर रहे हैैं बल्कि कमा भी रहे हैैं। पुरानी अस्पष्टता, अनिश्चितता तथा असुरक्षा के दिन लद गए हैैं और नई पीढ़ी करोड़ों के एनडोर्समेंट-प्रॉडक्ट प्लेसमेंट डील्स कर रही है और पूरे भारत तथा विदेश में भी आकर्षक संपत्ति खरीद रही है। क्या आजकल जो मूवीज बन रही हैैं, वे पुरानी शैली की फिल्मों से गुणवत्ता की दृष्टि से बेहतर हैैं? जूरी इस पर चुप्पी साधे रहती है लेकिन शोबिज में जबर्दस्त ऊर्जा लगती है और प्रत्येक व्यक्ति को व्यस्त रखने के लिए पर्याप्त काम होता है।

ऐसा ही खेल संस्थाओं तथा खिलाडिय़ों के साथ है। विश्व में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए उनकी प्रतिस्पर्धा की भावना जबर्दस्त रहती है। आज स्पोटर््स प्रबंधन तथा इनमें बढ़ती सेलेब्रिटीज की संख्या का यह आलम है कि उनकी व्यावसायिक क्षमता अच्छी है। अब वे दिन नहीं रहे जब स्पोटर््स से जुड़े लोगों को फंड के लिए प्रयास करना पड़ता था। यहां भी वैसा ही है कि चतुर मार्केटिंग प्रोफेनल्स काफी पैसा लाए हैैं। हो सकता है कि आईपीएल के गॉडफादर ललित मोदी भारत में वांछित आर्थिक अपराधी हों लेकिन उन्होंने जो कुछ किया उससे इस खेल में क्रांति आ गई और कई युवा क्रिकेटरों को कई मिलियन रुपए हासिल हुए। आईपीएल के मॉडल का इस्तेमाल करके कई स्पोटर््स में फ्रेंचाइजी का विस्तार हुआ। इनमें से अधिकांश काफी संपन्नता हासिल कर चुके हैैं।

इसी तरह रेस्तरां का व्यवसाय इस समय अनियंत्रित रफ्तार से बढ़ रहा है। सिर्फ उपभोक्ताओं को अच्छा खाना ऑफर करना ही आजकल पर्याप्त नहीं है बल्कि पैकेजिंग भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण इसमें ब्रांड रायल्टी बनाए रखना जरूरी है।

राजनीतिज्ञों को अन्य उत्पादों की तरह पैकेजिंग के साथ बेचे जाने में कोई आपत्ति नहीं है। चाहे कोई व्यक्ति अपने विचार बेच रहा है या फेयरनेस क्रीम बेच रहा है, स्ट्रेटेजी समान ही होती है। आप क्या मैसेज देते हैैं, यही सब कुछ है। दशकों पहले नेता को इसे लेकर जनता  के भरोसे पर खरा उतरना पड़ता था कि वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए क्या काम करेगा लेकिन आज वह एक इमेज मेकर पर सबसे पहले निवेश करता है और फिर घोषणापत्र के बारे में सोचता है। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि काफी धन राशि खर्च करके टिकट हासिल करने वाला आज का पालिश्ड तथा मीडिया सेवी राजनीतिज्ञ लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सभी उपलब्ध सोशल मीडिया प्लेटफार्म का इस्तेमाल करता है और आपका वोट झटक लेता है। दरअसल प्रत्येक चीज वस्तु के रूप में तब्दील हो गई है जिसमें ब्रांडिंग महत्वपूर्ण है।

सर्वदमन पाठक

Thursday, August 22, 2019

बासित की इस हरकत पर कोई भारतीय भरोसा नहीं करेगा

शोभा डे ब्लॉग से


मैैं एक शानदार होटल में आनंदिता के साथ कैपुसिनो की चुस्कियां ले रही हूं। यह मां-बेटी के साथ समय बिताने का भव्य अवसर है। हम लोग चर्चा कर रहे हैैं कि और क्या मंगाया जाए। तभी मेरा सेल फोन लगातार बजने लगता है। तभी एक मित्र रिपोर्टर मुझे इस संबंधी जानकारी उपलब्ध कराते हैैं। वे बताते हैैं कि भारत- स्थित पूर्व पाकिस्तानी हाई कमिश्नर अब्दुल बासित ने अपने देश के एक ब्लॉगर को दिये इंटरव्यू में दावा किया है कि उसने कश्मीर मुद्दे पर एक विशेष तरह का (पाकिस्तान समर्थक)लेख लिखने के लिए मुझे प्रभावित किया था। उसने मेरे कॉलम में लिखे गए कुछ हिस्सों को उद्धृत करते हुए इस लेख का श्रेय खुद को दिया है। मेरा पहला रिस्पांस यह था कि मैैं इस मामले को पूरी तरह खारिज करूं और इस पर खास तौर पर ट्रोल आर्मी द्वारा की जा रही गंदी तथा धमकी भरी टिप्पणियों पर आगे कोई प्रतिक्रिया नहीं दूं। लेकिन इस तरह के    कॉल्स मेरे पास आते चले गए तो मुझे लगा कि यह क्या हो रहा है? यह अब्दुल बासित कौन है और किस बारे में बात कर रहा है? दरअसल 27 जनवरी 2019 को जयपुर के रामबाग पैलेस होटल के लॉन में आयोजित एक साहित्योत्सव के स्वागत समारोह में मैैंने अपने पति के साथ हिस्सा लिया था। हम लोग अपने कुछ मित्रों, जिनमें लेखक, प्रकाशक तथा संपादक शामिल थे, के साथ गपशप कर रहे थे तभी अचानक व्हिस्की का टंबलर लिए हुए एक व्यक्ति वहां आ गया और कुछ ज्यादा ही दोस्ताना अंदाज में हम लोगों के साथ बातचीत करने लगा। कुछ समय बाद हम लोगों के समूह की गुस्से भरी बातों को सुनकर वह सिर झुकाकर वहां से चला गया। हम लोगों के बीच कुल तीन मिनिट की बात हुई। यह मेरी और बासित की पहली और अंतिम मुलाकात थी। और उसकी हिमाकत देखिये कि आज वह मुझे 'इंफ्लुएंसÓ करने की बात कर रहा है। वह झूठ बोल रहा है। वह संबंधित वीडियो में जिस कॉलम की बात कर रहा है, वह 2016 में लिखा गया था। अपने मुंह से बकवास करने के पहले उसने अपना होमवर्क तो सही तरीके से कर लिया होता।
सवाल यह है कि फिर मैैं यह प्रतिक्रिया क्यों दे रही हूं? इसकी वजह यह है कि इस सिलसिले में अपना दामन साफ रखना महत्वपूर्ण है। उसका आरोप गंभीर और खतरनाक है। मेरी चुप्पी का यह मतलब होगा कि मैैं उसके असत्य को चुनौती देने की इच्छा नहीं रखती। इसलिए एएनआई के अनुरोध पर मैैंने एक मिनिट के वीडियो में अपनी प्रतिक्रिया दी जिसे भीड़ भरे मॉल में आनंदिता ने शूट किया। इसके बाद तो ट्रोल आर्मी और सक्रिय हो गई। मुझे बताया गया कि मेरा नाम भारत के उन 300 लेखकों, चिंतकों में शामिल है जो आईएसआई के 'पे रोलÓ पर हैैं। ये लोग पाकिस्तान के लिए काम करते हैैं और भारत विरोधी नीतियों का समर्थन करते हैैं। ये आरोप काफी विस्फोटक हैैं और इन आरोपों का पूरी ताकत से खंडन किया जाना चाहिए। हकीकत यह है कि धारा 370 के मुद्दे पर विश्व का जनमत पाकिस्तान के खिलाफ है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री महमूद कुरैशी तक को यह स्वीकार करना पड़ा है कि पाकिस्तान के लोग मूर्खों की दुनिया में रह रहे हैैं। बासित ने सोचा होगा कि जब पाकिस्तान की विश्वसनीयता बुरी तरह गिर गई है, तो वह अचानक मेरा नाम उछालकर लोगों का ध्यान वास्तविकता से भटका देगा। लेकिन ऐसा हो नहीं सकेगा। मुझ पर कई आरोप लग सकते हैैं लेकिन किसी ने भारत के प्रति मेरी निष्ठा को कभी चुनौती नहीं दी। हां, यह सच है कि मेरा व्यक्तित्व और विचार स्वतंत्र हैैं लेकिन मैैं किसी राजनीतिक दल से चुड़ी नहीं हूं। मैैं जो महसूस करती हूं, वही कहती हूं। यह मेरा अधिकार है कि मैैं विचारों के मुताबिक किसी सरकार को चुनौती दूं या उसकी आलोचना करूं, चाहे कोई भी सरकार सत्ता में हो। यह एक नागरिक का विशेषाधिकार है और मैं इसे छोड़ नहीं सकती, चाहे जो भी हो। लेकिन यह अब्दुल बासित मुझे डिसक्रेडिट करने वाला कौन होता है। कौन इस झूठे व्यक्ति पर भरोसा करेगा। मेरे विचार खुले हैैं और यह सभी को मालूम है। मेरे फोन टेप करो, मेरे ईमेल हैक करो, जब भी मैैं बाहर निकलूं तो मेरा पीछा करो, सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर मेरी बातों की छानबीन करो, मेरा लैपटॉप ले लो लेकिन मेरे शर्मिंदा होने या मुंह छिपाने लायक इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा। इसलिए अब्दुल बासित, तुमने गलत महिला से पंगा लिया है। तुम्हारी बात पर कोई भी भरोसा नहीं करेगा। इससे अच्छा होता कि तुम अपने देश पर ध्यान देते कि वहां क्या गड़बड़ी हो रही है। देश किसी भी राजनीतिक पार्टी सेे शक्तिशाली है और मैैं जिन बातों पर भरोसा करती हूं, उनके लिए पूरी शिद्दत से लड़ती रहूंगी। अब्दुल बासित, यदि तुम सोचते हो कि तुम इस तरह की हरकतों से जीत जाओगे तो यह तुम्हारी भूल है। इसलिए अच्छे बच्चे की तरह पाकिस्तानी जनरल्स से सॉरी कहो और उनसे आग्र्रह करो कि वे तुम्हारा पॉकेट मनी न काटें।
प्रस्तुति: सर्वदमन पाठक

Thursday, August 8, 2019



हम टुटपुंजिए चोरों की तरह व्यवहार क्यों करते हैैं?



बाली से एक वीडियो आया है जिसमें होटल स्टाफ द्वारा एक संपन्न भारतीय परिवार को चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़े जाते दिखाया गया है। यह उस समय का वीडियो है जब वह परिवार अपने कमरे से चोरी किये गए सामानों से भरे सूटकेस के साथ रवाना होने वाला था। जब होटल के कर्मचारियों ने हेयर ड्रायर्स, सोप डिस्पेंसर्स, टॉवल, हैैंगर, डेकोरेटिव आइटम सहित चोरी का सामान टेबिल तथा अन्य स्थानों से निकाला तो इस वायरल वीडियो में तमाम चश्मदीद खुद को शर्मिंदा तथा अपमानित महसूस करते दिख रहे थे। इन पर्यटकों को यह बात काफी चुभी कि चोरी के सामान के साथ पकड़े गए लोग उसके बाद भी सीनाजोरी कर रहे थे। पहले तो उन्होंने चोरी से इंकार करते हुए काफी उत्तेजना दिखाई लेकिन बाद में चोरी के सामान के 'भुगतानÓ के लिए तैयार हो गए। आखिर में तो पुराना तरीका अपनाते हुए गुस्से में भरे स्टाफ को ले देकर मामला सुलझाने की भी कोशिश की। यह सभी कुछ रिकार्डेड था और सारी दुनिया ने इसे देखा। यह भारत की हंसी उड़ाने वाला वाकया था। बाली में पकड़े गए उक्त भारतीय परिवार के अलावा भी कई ऐसे संपन्न भारतीय परिवार की ऐसी खबरें पहले भी मिली हैैं जो बर्न के पास 30 लाख रुपये प्रति रात्रि किराये वाले स्की रिसोर्ट में रुके थे। इस रिसोर्ट के प्रबंधन द्वारा लोगों को आगाह किया जाता रहा है कि वे अपने कमरे से कांप्लिमेंटरी ब्रेकफास्ट बफे के सामान भी नहीं ले जा सकते लेकिन लोग अपने मित्रों के व्हाट्सऐप ग्र्रुप में यह स्वीकार करते रहे हैैं कि उन्होंने ब्रेकफास्ट के लिए सजी टेबिल से बन्स तथा क्रोइसिएंट लाने का अपराध किया है। अब वे खुद से पूछ रहे हैैं कि इस वीडियो में दिख रहे चोरी करते पकड़े गए लोगों से वे क्या किसी भी तरह से बेहतर हैैं। चोरी कैसी होती है? क्या इनमें से कोई भी चोरी का औचित्य ठहरा सकता है या क्या उन्हें माफ किया जा सकता है? 
समाजशास्त्रियों से यह पूछना रोचक होगा कि हम टुटपुंजिये चोरों की तरह क्यों व्यवहार करते हैैं। हम अपने लपकते हुए हाथों को कुकी जार से बाहर क्यों नहीं रख सकते? क्या इसका भूख से वंचित रहने की किसी काफी पहले दफन हो चुकी याद से कुछ लेना देना है? प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अपनी कहानियां हैैं कि किस तरह उनके दादे-परदादे भूखे रह जाते थे ताकि उनके बच्चे खाना खा सकें। चूंकि खाना और प्रगति एक दूसरे से जुड़े हुए हैैं इसलिए हमारा भूखमरों की तरह खाना इस बात से संबंधित है कि हम कैसे बड़े होते हैैं-कितने अधिक या कितने कम संसाधनों के साथ? ऐसी स्मृतियों को पूरी तरह से दिलोदिमाग से हटा देना आसान नहीं होता। संपन्न लोगों में भी यह असुरक्षा की भावना रहती है कि खाना कहीं खतम न हो जाए इसलिए इसे जमा कर लो। हम सिर्फ खाने के सामान तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि आराम से कुछ भी या सब कुछ चुरा लेते हैैं। एक हेयर ड्रायर की कीमत आत्मसम्मान के आसपास भी नहीं होती। अपना सिर ऊंचा रखें। 
                                सर्वदमन पाठक

Tuesday, August 6, 2019

एक और ‘अगस्त क्रांति’

अपने दूरगामी फैसलों से देश को जब तब चमत्कृत कर देने वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने अब अपनी चमत्कारी शैली से राष्ट्र की आजादी की नई इबारत लिख दी है। सुखद संयोग यह है कि आजादी के बाद से ही अलगाववाद और आतंकवाद के नासूर से देश को मर्मांतक पीड़ा पहुंचाने वालेकश्मीर को , 370 तथा अनुच्छेद 35-ए के खात्मे की सर्जरी से निजात दिलाने का यह करिश्मा अगस्त माह में ही हुआ, जो अगस्त क्रांति(9 अगस्त 1942) तथा स्वतंत्रता दिवस(15 अगस्त 1947) के रूप में आजादी के महत्वपूर्ण पड़ाव का साक्षी रहा है। स्वाभाविक है कि इस फैसले के बाद कश्मीर अब अन्य हिस्सों की तरह ही देश का एक हिस्सा हो जाएगा और इसका विशेष दर्जा खत्म हो जाएगा जो भेदभाव की एक बड़ी वजह था। पूर्ण राज्य का दर्जा खत्म कर कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाने तथा लद्धाख को उससे पृथक केंद्र शासित प्रदेश में तब्दील करने की रणनीति कश्मीर राज्य के भीतर भाजपा की रची जाने वाली व्यूहरचना का ही संकेत है। इस फैसले के दूरगामी प्रभावों को देखते हुए यह अनुमान लगाना कोई रॉकेट साइंस जैसा मुश्किल नहीं है कि ऐतिहासिक भूलों से देश की पूर्ण आजादी के सामने सवालिया निशान बनकर खड़े कश्मीर का भूगोल और सियासत इस फैसले से पूरी तरह बदल जाएगी और आतंकवाद परोसने वालों के हाथों की कठपुतली बने स्थानीय नेता घाटी के भोले भाले लोगों को अपनी उंगलियों पर नचाने की ताकत खो बैठेंगे। आतंकवाद के निर्यातक पड़ौसी देश पाकिस्तान तथा स्थानीय आतंकवादियों के समर्थन से अपनी राजनीतिक दूकान चमकाने वाले नेताओं की बेचैनी तथा बौखलाहट इस बात का जीता जागता प्रमाण है। सारे देश में मनाया जा रहा जश्न यही दर्शाता है कि देश इस फैसले की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा था। वास्तविकता यह है कि देश की इस आकांक्षा को सरकार ने पूरी शिद्दत से महसूस किया और इसी जनाकांक्षा ने उसे इतने बड़े फैसले के लिए शक्ति और मनोबल प्रदान किया। सरकार की यह राजनीतिक इच्छाशक्ति उसे देश की सियासत में माइलेज प्रदान करे तो आश्चर्य ही क्या है। कुछ राजनीतिक दल अपने पूर्वाग्र्रहों के कारण इस कदम का  विरोध कर रहे हैैं, वह उनकी राजनीतिक अअदूरदर्शिता ही है। 
इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता कि भले सरकार ने साहस का परिचय देते हुए यह अहम फैसला किया है लेकिन इन कदमों के क्रियान्वयन का रास्ता उतना आसान नहीं होगा। कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की शतरंज में एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है और इस खेल में भारत कितनी चतुराई से अपनी चाल चलता है, उक्त फैसले की सफलता इस पर भी निर्भर करेगी। फिलहाल घाटी में भारत की भारी सैन्य उपस्थिति के कारण वहां पनप रहे असंतोष और गुस्से का कोई सटीक अंदाजा लगाना मुश्किल है लेकिन वहां की जनता की भावनाओं की जीतना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। 
      सर्वदमन पाठक

Sunday, October 1, 2017

केकवॉक में साजिशों की कुकिंग

शोभा डे का ब्लॉग


जब से गौरी लंकेश की हत्या हुई है, मैैं लिखने के लिए 'सुरक्षितÓ टॉपिक की तलाश में हूं। मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि मैैंने अंतत: ऐसा एक विषय तलाश लिया है-वह है 'केक बेकिंगÓ। लेकिन इसमें थोड़ी समस्या है। मैैंने जिंदगी में कभी केक बेक नहीं किया है। सिर्फ कुछ केक खाए अवश्य हैैं। लेकिन इससे उस विषय पर कॉलम लिखने में मुझे कुछ भी रुकावट नहीं आती, जिसके बारे में मैैं बहुत कम जानती हूं। ठीक वैसा ही गौरी के बारे में कहा जा सकता है। उसके जीवन और मौत के बारे में टिप्पणी करने वाले कितने लोग उसके बारे में पर्याप्त रूप से जानते हैैं? बहुत कम। कितने लोग उन परिस्थितियों से वाकिफ हैैं जिनके तहत गौरी की हत्या की गई? बहुत कम। उसके हत्यारे या हत्यारों की पहचान के बारे में कौन जानता है? अभी तक कोई नहीं। लेकिन हम सभी इस बारे में अपनी राय जाहिर कर रहे हैैं, निष्कर्ष निकाल रहे हैैं और अपने अपने अंदाज लगा रहे हैैं जिसका इससे कोई संबंध नहीं है।
केक के साथ भी ऐसा ही है। हम आकर्षक पेटिसरीज में जाते हैैं और वहां सजे हुए केक के बारे में सर्वे करते हैैं मानो हम सभी केक एक्सपर्ट हों। फिर हम एक केक चुन लेते हैैं जो हमारे बजट तथा रुचि के अनुरूप होता है। हम उसका एक टुकड़ा चखते हैैं और उसे नापसंद कर देते हैैं। हम अपना पैसा वापस चाहते हैैं लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। फिर हम उसमें कमियां निकालना शुरू कर देते हैैं। हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैैं कि हमें पेस्ट्री शॉप द्वारा ठगा गया है क्योंकि बेकर ने इसमें आटा एवं बटर सही अनुपात में इस्तेमाल नहीं किया। हम खुद ही तय कर लेते हैैं कि केक में घटिया स्तर की चॉकलेट इस्तेमाल की गई थी, ओवन डिफेक्टिव था, क्रीम कम थी, बेकर ने ज्यादा नमक का इस्तेमाल किया था या पैकेजिंग भ्रामक थी। हम उस केक शॉप का बहिष्कार करने की ठान लेते हैैं। हम अपने बुरे एक्सपीरियंस के बारे में अपने दोस्तों को बताते हैैं। वे दूसरों को बताते हैैं। आखिरकार जनता की राय के सामने झुकते हुए उक्त केक शॉप अपनी दुकान बंद हो जाता है।  
गुस्सा फैलता है। कुछ केक प्रेमी खुद ही केक बनाते का फैसला करते हैैं। वे अपना एक ग्र्रुप बना लेते हैैं। हर कोई तो इस ग्र्रुप में शामिल हो नहीं सकता। इस ग्र्रुप में शामिल होने को लेकर कुछ लोग जुनूनी हो सकते हैैं। उन्हें उचित तवज्जो न दिये जाने पर वे विरोध स्वरूप अपना प्रतिद्वंदी केक ग्र्रुप बना लेते हैैं। इससे टकराव हो जाता है और पड़ौस की शांति को खतरा उत्पन्न हो जाता है। पथराव की कुछ घटनाएं होती हैैं। कुछ भड़काऊ पर्चेबाजी भी होती है। अनियमितताओं के आरोप लगाए जाते हैैं और स्थिति नियंत्रण के बाहर हो जाती है। जो लोग केक पसंद नहीं करते, वे अपना अलग ग्र्रुप बनाकर विरोध प्रदर्शित करने लगते हैैं। वे 'शुद्ध देशी घी मिठाई क्लबÓ बना लेते हैैं। कुछ लोग केक को राष्ट्र विरोधी घोषित करते हुए पूछते हैैं कि ये केकवाले केक ही क्यों बनाते हैैं, जलेबी और रसगुल्ला क्यों नहीं बना सकते? इसके पीछे कोई विदेशी हाथ होना चाहिए। केक भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। इसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए। इस बीच प्रमुख केक बेकर्स पर सतर्क निगाह रखी जाती है। कोई मोर्चा निकालने का सुझाव देता है तो दूसरा सुझाता है कि केंडल मार्च निकाला जाए क्योंकि इसे ज्यादा टेलीविजन कवरेज मिलेगा। इनका नेता गरजता है कि हम इन केक बेकर्स के खिलाफ कुछ ज्यादा ही नरम रुख अपना रहे हैैं। वे हमारी सोसायटी के लिए खतरनाक हैैं। केक सारे देश में फैल जाए, इसके पहले हमें उनको रोकने के लिए रणनीति बनानी होगी। केक पश्चिमी प्रोपेगंडा का हिस्सा है। हमारे युवक और भ्रष्ट हों, इसके पहे केक क्रांति को खत्म करना जरूरी है।
केक प्रशंसकों के तेजी से हो रहे फैलाव को रोकने के लिए एक योजना तैयार की जाती है। केक प्रशंसकों की लिस्ट तैयार की जाती है और   उन्हें चेतावनी दी जाती है कि वे केक की तारीफ बंद करें या फिर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें। उनमें से एक व्यक्ति सलाह देता है कि चीफ बेकर को केक बनाने से रोका जाए लेकिन सवाल यह उठता है कि कैसे क्योंकि केक नुकसानदेह तो है नहीं। केक की तारीफ करने वालों को सबक सिखाने के लिए सीधी कार्रवाई के तौर पर पेड़ा और बर्फी के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करने का फैसला किया जाता है और कोई मोटर साइकिल पर सवार होकर इनके कई हेलमेटधारी समर्थक इसे अंजाम देने के लिए निकल पड़ते हैैं।
इधर मैैं दुविधा में हूं। सवाल यह है कि मैैं केक बनाऊं या न बनाऊं।
प्रस्तुति: सर्वदमन पाठक