मुरैना जिले के सांवरिया गांव में एक साधु का आत्मदाह रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना है। हैरत की बात तो यह है कि इस घटना के दौरान पुलिस मौजूद थी लेकिन वह पूरी तरह से मूकदर्शक बनी रही। दरअसल यह घटना धर्म के नाम पर बनाई गई ऐसी अवैज्ञानिक धारणा का परिणाम है जिससे उपजी मनोवैज्ञानिक विकृतियां आत्मघात की हद तक जा सकती हैं। उक्त साधु को भी यह गलतफहमी हो गई थी कि वह खुद को अग्रि को समर्पित कर मोक्ष प्राप्त कर लेगा। यह घटना पुलिस की निष्क्रियता एवं अकर्मण्यता को भी रेखांकित करती है क्योंकि उक्त साधु ने यह कदम अकस्मात ही नहीं उठाया बल्कि वह पूरे गांव में घूम घूम कर इसकी घोषणा करता रहा। पुलिस को भी इसके बारे में अग्रिम रूप से जानकारी थी और पुलिस को वहां भेजा भी गया था लेकिन पुलिस ने इस दिल दहला देने वाले हादसे के रोकने के लिए कुछ नहीं किया। एक पुलिस अधिकारी ने प्रेस कांफ्रेस में इस घटना को महाराज जी के समाधि लेने जैसा कदम बताते हुए इसे महिमामंडित करने का प्रयास किया। इससे यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि पुलिस भी साधु से चमत्कृत थी और इसी वजह से उसने इसे रोकने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। इस पूरे मामले पर राज्य सरकार की प्रतिक्रिया भी कम आश्चर्यजनक नहीं रही। गृहमंत्री जगदीश देवड़ा ने तो इस पर जो प्रतिक्रिया दी, वह सरकार की संवेदनशीलता पर ही प्रश्र चिन्ह लगा गई। उन्होंने दोषी पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई की घोषणा करने के बदले इसे जांच का विषय बताकर जाने अनजाने में इसकी गंभीरता को कम करने का प्रयास किया है। संभवत: प्रदेश की सत्ता पर काबिज पार्टी का धार्मिक रुझान भी इसका एक कारण हो सकता है। लेकिन इस घटना के समय साधु को रोकने के बदले उसकी जय जयकार करने वाली भीड़ को भी इस मामले में कम दोषी नहीं माना जा सकता जो आस्था के नाम पर भावनाओं के ऐसे ज्वार में बह रही थी जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं था। यह आत्मदाह भी सती प्रकरण जैसा ही मामला है जो भीड़ के मनोविज्ञान पर आधारित है। पुलिस ने कई बार सती होने की घटना अथवा उसके प्रयास पर आपराधिक प्रकरण दर्ज कर कानून सम्मत कार्रवाई की है और दिग्विजय सरकार के शासनकाल में तो सती होने संबंधी एक दो प्रकरणों पर पूरे गांव पर सामूहिक जुर्माना भी लगाया गया था तब इस मामले में पुलिस ने सख्ती के साथ कार्रवाई क्यों नहीं की, यह समझ से परे है। पुलिस का यह तर्क गले नहीं उतरता कि कार्रवाई करने पर भीड़ के हिंसक होने का खतरा था। भीड़ की हिंसा का भय दिखाकर यदि पुलिस अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ ले तो फिर ऐसी पुलिस पुलिस के नाम पर धब्बा ही है। राज्य सरकार को इस मामले की गंभीरता को महसूस करते हुए फर्ज न निभाने वाले पुलिस कर्मियों पर तो समुचित कार्रवाई करनी ही चाहिए, उन लोगों पर भी सामूहिक रूप से कार्रवाई होना चाहिए जो जय जयकार करने वाली भीड़ का हिस्सा बनकर परोक्ष रूप से इस घटना को अंजाम देने में मदद कर रहे थे।
-सर्वदमन पाठक
Wednesday, October 14, 2009
Tuesday, October 13, 2009
जन सुनवाई का दर्द
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि राज्य में पुलिस प्रशासन द्वारा आम लोगों की शिकायतों को दूर करने के लिए शुरू की गई जन सुनवाई अब जन- हताशा तथा कई प्रकरणों में जन-यातना का कारण बन गई है। जन सुनवाई में फरियादी के रूप में आने वाले लोगों में आनुपातिक दृष्टि से काफी कम फीसदी लोग इतने भाग्यशाली होंगे जिनकी समस्या का संतोषजनक निदान हुआ है और जन सुनवाई से राहत महसूस कर रहे हैं जबकि अधिकांश फरियादियों का अनुभव इसके ठीक विपरीत है। यह फोरम आजकल रसूख एवं रुतबे वाले लोगों का हथियार बन गया है। इस फोरम में लोग बड़ी उम्मीद के साथ विभिन्न स्तरों पर होने वाले अन्याय की शिकायत लेकर आते हैं। यह शिकायत आम तौर पर या तो ऐसे अपराधियों के खिलाफ होती है जो धन बल तथा बाहुबल के दम पर उनके अधिकारों का हनन करते हैं या फिर उनकी शिकायत उन पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों से होती है जो अन्याय करने वाले का ही साथ देते हैं। इन फरियादियों को आशा रहती है कि आला पुलिस अफसर तो कम से कम उनको सताने वाले अपराधियोंं अथवा उन्हें प्रश्रय देने वाले पुलिस कर्मियों के खिलाफ समुचित कार्रवाई कर उन्हें न्याय दिलाएंगे लेकिन उन्हें इनके दर से भी निराश लौटना पड़ रहा है। न्याय मिलना तो दूर, उन्हें दूबरे और दो आषाढ़ जैसी स्थिति से रूबरू होना पड़ रहा है। शिकायत के बाद एक ओर तो अपराधियों का गुस्सा और भड़क उठा है, वही दूसरी ओर उन्हें अपराधियों की संरक्षणदाता पुलिस का भी कोप-भाजन बनना पड़ रहा है। बड़े जोर शोर से शुरू हुई जन सुनवाई की मुहिम असफलता के किस मोड़ पर पहुंच गई है इसके गवाह स्वयं सरकार के आंकड़े हैं। इन आंकड़़़ों के अनुसार जन सुनवाई में कुल 78 हजार शिकायतें आई हैं जिनमें से कुल 10 से 12 हजार शिकायतों का ही निराकरण हो सका है। यदि यह कहा जाए कि बाकी शिकायतकर्ता इस जन सुनवाई में शिकायत करके पछता रहे हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कई मामलों में तो शिकायतकर्ताओं के साथ यह खिलवाड़ हो रहा है कि जिन पुलिस अफसरों के खिलाफ पक्षपात अथवा लापरवाही की शिकायत है, उन्हें ही जांच का जिम्मा सौंप दिया गया है। जब आरोपी ही जांचकर्ता बन जाए तो यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि जांच का परिणाम क्या होगा और शिकायतकर्ता का क्या हश्र होगा। इस जन सुनवाई का सबसे बड़ा दोष यही है कि शिकायत की जांच के आदेश दे दिये जाने के बाद उसका क्या हश्र हुआ इसकी मानीटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए इसमें दिये गए तमाम आदेश धूल खा रहे हैं और बेचारा शिकायतकर्ता अपनी किस्मत को रो रहा है। दरअसल जन सुनवाई अपने आप में एक अच्छी पहल है लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमी यही है कि इसके फालो अप एक्शन की कोई कारगर व्यवस्था नहीं है। यदि सरकार जन सुनवाई की सफलता चाहती है तो उसे यह पहल उपरोक्त दोषों से मुक्त करनी होगी वरना यह पीडि़तों के खिलाफ अपराधियों एवं पुलिस के गंठजोड़ का एक और बहाना बन कर रह जाएगी।
सर्वदमन पाठक
सर्वदमन पाठक
Monday, October 12, 2009
अपराध है भारत की शान उडऩपरी पीटी उषा का अपमान
भोपाल में चल रही राष्टï्रीय ओपन एथलेटिक्स प्रतियोगिता में कोच के बतौर शामिल होने आई देश के इतिहास की सर्वश्रेष्ठ धाविका पी टी उषा उस समय अचानक सुखियों में आ गई जब उनके आगमन पर आयोजकों ने उनको कोई महत्व नहीं दिया और उनके स्वागत एवं ठहरने की कोई उचित व्यवस्था नहीं की और इस कारण उनकी आंखों में छलछला आए आंसुओं एव उनकी पीड़ा को प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिये सारे देश ने महसूस किया। इस मुद्दे पर हुई मध्यप्रदेश सरकार एवं आयोजकों की आलोचना के बाद उन्हें आलीशान होटल में रुकवा कर तथा उनसे खेद जताकर राज्य सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने समझदारी का परिचय दिया और अपनी सरकार को फजीहत से बचाया। यह एक तरह का अपराध ही था जिसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। यह अलग बात है कि पीटी उषा ने बाद में इस मामले को तूल न देकर अपनी अकादमी की बालाओं के परफारमेंस पर ध्यान केंद्रित किया और उनकी अकादमी की पांचों बालाओं को एथेलेटिक्स में पदक हासिल किया। इतना ही नहीं, उन्हीं की अकादमी की ही एक बाला को सर्वश्रेष्ठï एथलीट के खिताब से नवाजा गया। यदि पीटी उषा की उपलब्धियों पर गौर किया जाए तो यह स्पष्टï हो जाता है कि उनका कद देश के किसी भी एथलीट से ऊंचा है।केरल के छोटे से गांव पायोली में 27 जून 1964 को जन्मी पीटी उषा अपने बचपन में काफी बीमार रहा करती थी लेकिन इसके बावजूद उनकी अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर प्रायमरी स्कूल के दिनों में ही धााविका के रूप में अपनी धाक जमा ली थी। 1976 में केरल सरकार ने कन्नूर में कन्याओं के लिए स्पोट्र्स डिवीजन की शुरुआत की और जो चालीस बालाएं इसमें चुनी गईं , उनमें 12 वर्षीय पीटी उषा भी शामिल थी। कोच नांबियार के मार्गदर्शन में उषा ने अपना प्रशिक्षण प्रारंभ किया । उषा की मेहनत रंग लाई और 1979 में राष्टï्रीय खेलकूद में उन्होंने व्यक्तिगत चेंपियनशिप हासिल की। 1980 में कराची में आयोजित पाकिस्तान ओपन नेशनल मीट से अंतर्राष्टï्रीय खेलकूद में पदार्पण किया। इस प्रतियोगिता में उन्हें चार स्वर्णपदक प्राप्त हुए। 1982 में सियोल में आयोजित वल्र्ड इनविटेशन जूनियर एथेलेटिक्स मीट जिसे आजकल विश्व जूनियर एथेलेटिक्स चेंपियनशिप कहा जाता है, में उषा ने हिस्सा लिया जिसमें 200 मीटर में स्वर्णपदक तथा 100 मीटर में कांस्य पदक लेकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का एक और सबूत दिया। 1982 में भारत में हुए एशियाड में उन्हें 100 एवं 200 मीटर दौड़ में रजत पदक से संतोष करना पड़ा हालांकि कुवैत में इसी वर्ष आयोजित एशियन ट्रेक एंड फील्ड प्रतियोगिता में उन्होंने नए रिकार्ड के साथ 400 मीटर का स्वर्णपदक जीता। उन्होंने इसके बाद अपने परफोरमेंस पर अपना ध्यान केंद्रित किया और 1984 के लास एंजेल्स ओलंपिक में 400 मीटर बाधा दौड़ में वे चौथे स्थान पर रहीं। वे एक सेकेंड के सौंवे भाग से कांस्य पदक से वंचित रह गईं। हालांकि वे भारत की पहली महिला एथलीट बन गईं जो विश्व ओलंपिक की किसी दौड़ में फाइनल में पहुंची हो। उन्होंने उस समय इस प्रतियोगिता में 55.42 सेंकेंड का जो समय निकाला था जिसे आज भी कोई भारतीय महिला एथलीट छू नहीं सकी है।1985 में एशियाई ट्रेक एंड फील्ड प्रतियोगिता में भारत का परफोरमेंस उषा के इर्दगिर्द ही घूमता रहा जहां उन्होंने पांच स्वर्णपदक एवं एक कांस्य पदक हासिल कर अकेले दम पर तिरंगे की शान कायम रखी। इसके अगले वर्ष 1986 में उन्होंने सियोल एशियाड में चार स्वर्णपदक क्रमश: 200 मीटर, 400 मीटर, 4 गुणा 400 रिले एवं 400 मीटर बाधा दौड़ में हासिल कर देश का नाम ऊंचा किया लेकिन एक प्रतियोगिता में दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से 400 मीटर बाधा दौड़ में उनकी एड़ी में चोट लगने की वजह से उनका दौड़ का कैरियर काफी प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ। इस कारण 1988 के सियोल ओलंपिक में उसका प्रदर्शन अपनी कोई छाप नहीं छोड़ सका।यह उषा की संकल्प शक्ति का ही कमाल था कि उसने अपने शारीरिक कष्टों के बावजूद फिर वापसी की और 1989 में दिल्ली में आयोजित एशियाई ट्रेक एंड फील्ड प्रतियोगिता में चार स्वर्ण एवं दो रजत पदक जीत कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया। वे उस समय रिटायरमेंट लेना चाहती थीं लेकिन देश के दबाव पर उन्होंने 1990 के बीजिंग एशियाई खेलों में हिस्सा लिया और पूरी तरह तैयार न होने के बावजूद तीन रजत पदक जीते।1991 में उन्होंने खेल से संन्यास ले लिया और वी विश्वनाथन से विवाह करके गृहस्थी बसा ली लेकिन 1998 में उन्होंने अपनी जबर्दस्त इच्छाशक्ति के बल पर फिर वापसी की और जापान में आयोजित एशियन ट्रेक एंड फील्ड प्रतियोगिता में 200 और 400 मीटर की दौड़ में कांस्य पदक जीत कर दिखाए। इस प्रतियोगिता में अपना ही 200 मीटर का रिकार्ड तोड़कर नया राष्टï्रीय रिकार्ड बनाया।
पीटी उषा को 1983 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो 1985 में उन्हें पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया। इसके अलावा उन्हें इंडियन ओलंपिक एसोसियेशन द्बारा स्पोट्र्स परसन आफ द सेंचुरी और स्पोटर््स वीमेन आफ द मिलेनियम का भी प्रतिष्ठïापूर्ण खिताब दिया गया है। जकार्ता एशियाड में उन्हें महानतम एथलीट नामांकित किया गया और 1985 एवं 1986 में उन्हें सर्वश्रेष्ठï एथलीट के लिए विश्व ट्राफी प्रदान की गई। दरअसल उनकी इन स्वर्णिम उपलब्धियों के कारण ही उन्हें गोल्डन गर्ल एवं उडऩपरी के रूप में जाना जाता है। आज भी वे उषा एकादमी के जरिये नवोदित खिलाडिय़ों को ट्रेनिंग दे रही हैं और ये खिलाड़ी देश एवं विदेश में अपनी इस महान प्रशिक्षक का एवं देश का नाम रोशन करेंगी इसकी पूरी उम्मीद नजर आती है।
-सर्वदमन पाठक
पीटी उषा को 1983 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो 1985 में उन्हें पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया। इसके अलावा उन्हें इंडियन ओलंपिक एसोसियेशन द्बारा स्पोट्र्स परसन आफ द सेंचुरी और स्पोटर््स वीमेन आफ द मिलेनियम का भी प्रतिष्ठïापूर्ण खिताब दिया गया है। जकार्ता एशियाड में उन्हें महानतम एथलीट नामांकित किया गया और 1985 एवं 1986 में उन्हें सर्वश्रेष्ठï एथलीट के लिए विश्व ट्राफी प्रदान की गई। दरअसल उनकी इन स्वर्णिम उपलब्धियों के कारण ही उन्हें गोल्डन गर्ल एवं उडऩपरी के रूप में जाना जाता है। आज भी वे उषा एकादमी के जरिये नवोदित खिलाडिय़ों को ट्रेनिंग दे रही हैं और ये खिलाड़ी देश एवं विदेश में अपनी इस महान प्रशिक्षक का एवं देश का नाम रोशन करेंगी इसकी पूरी उम्मीद नजर आती है।
-सर्वदमन पाठक
Friday, October 9, 2009
मिलावटियों पर अंकुश जरूरी
मक्सी रोड पर करोड़ों का नकली घी पकड़े जाने की कार्रवाई एक स्वागत योग्य कार्रवाई है लेकिन इस सिलसिले को लगातार आगे बढ़ाने की जरूरत है। दरअसल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में नकली घी का जानलेवा कारोबार काफी समय से चल रहा है और प्रशासन के भ्रष्टï अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त होने से इन व्यवसायियों पर नकेल नही कसी जा सकी है। यह पहला अवसर नहीं है जब मिलावटियों पर छापा मारा गया है। कुछ माह पहले गुना एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में काफी बड़ी मात्रा में नकली खोवा पकड़ा गया था लेकिन संभवत: कुछ प्रभावशाली नेताओं के हस्तक्षेप के कारण मिलावटियों पर कार्रवाई का सिलसिला अंजाम तक पहुंचने के पहले ही थम गया। इसके बाद अभी कुछ दिन पूर्व ही इंदौर में नकली घी का बड़ा स्टाक पकड़ा गया और अखबारों में इस कार्रवाई में हिस्सा लेने वाले अफसरों ने वाहवाही भी लूट ली लेकिन इक्का दुक्का कार्रवाई के बाद कतिपय कारणों से इसमें विराम लग गया। अब फिर से छापामार कार्रवाई हुई है तो लोग पूछ रहे हैं कि छापामार कार्रवाई की यह किश्त भी तो कहीं राजनीतिक एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप से रुक नहीं जाएगी। यह कोई रहस्य नहीं है कि यह अवैध कारोबार स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत एवं राजनीतिक संरक्षण के बल पर ही चलता है और इन मिलावटियों द्वारा अपने मुनाफे में से इन अधिकारियों को भी उपकृत किया जाता है। यदि इन मिलावट के इस धंधे पर अंकुश लगाया जाना है तो फिर भ्रष्टाचार के इस कुचक्र को तोडऩा जरूरी होगा। लेकिन इसकेे लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति सबसे पहली शर्त है।सवाल यही है कि राज्य सरकार इस इच्छाशक्ति का प्रदर्शन कर पाएगी। इस मामले में सरकार की परीक्षा की घड़ी करीब ही है क्योंकि दीपावली पर खोवे एवं शुद्ध घी की सबसे ज्यादा खपत होती है। स्वाभाविक रूप से व्यापारी इस अवसर पर अपना नकली स्टाक खपाने की पूरी पूरी कोशिश करेंगे। दिल्ली, मथुरा सहित मध्यप्रदेश के इससे जुड़े सीमावर्ती क्षेत्रों से काफी बड़ी मात्रा मेें खोवा मध्यप्रदेश में बिकने के लिए आता है अत: नकली एवं मिलावटी खोवे की प्रदेश में बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए इन क्षेत्रों पर निगाह रखी जानी चाहिए। जहां तक भोपाल की बात है तो यहां दीपावली पर 35 से 50 क्विंटल खोवे की खपत होने की संभावना है जबकि आम तौर पर यह खपत 15 से 20 क्विंटल होती है। यदि इस अवसर पर नकली खोवे एवं नकली घी को शहर में बेचने के मिलावटियों के मंसूबों को नाकाम नहीं किया गया तो फिर शहरवासियों को भी इससे इनकी सेहत पर पडऩे वाले घातक परिणामों का सामना करना पड़ेगा। अत: यह वक्त का तकाजा है कि राज्य सरकार भोपाल सहित सभी जिलों के प्रशासन को पूरी तरह से मिलावटियों के खिलाफ सतर्क रहने के निर्देश दे और वक्त रहते लोगों को मिलावटियों के कहर से बचाये ताकि लोग आनंद के साथ इस ज्योति पर्व को मना सकें। इसके साथ ही मिलावटियों के खिलाफ कार्रवाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए रणनीति बनाई जाए और उसे अमलीजामा पहनाया जाए।
-सर्वदमन पाठक
-सर्वदमन पाठक
Wednesday, October 7, 2009
आंसुओं पर राजनीति
भोपाल में अपनी उपेक्षा से दुखी विश्व ख्यातिलब्ध धाविका पीटी उषा के आंसुओं से उठे सैलाब ने राष्टï्रीय ओपन एथलेटिक्स के आयोजन के पहले ही इसकी रंगत फीकी कर दी है। प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिये इस सनसनीखेज खबर के प्रसारित होने के साथ ही जब उषा के साथ हुए दुव्र्यहार पर चारों ओर आलोचना के स्वर तेज होने लगे तब कहीं जाकर प्रदेश सरकार को सुध आई और लोकनिर्माण मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने उन्हें मनाकर जहांनुमा होटल में ससम्मान ठहराया। उषा को सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि साई के कार्यक्रम में भाग लेने आई इस प्रतिष्ठिïत धाविका को हवाई अड्डï्े पर कोई भी साई अधिकारी लेने नहीं आया और साई होस्टल पहुंचने पर भी उसे कोई तवज्जो नहीं दी गई। इसके लिए बहाना बनाया जा रहा है कि साई को उषा के आने की कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन यह बहाना साई के माथे पर लगे कलंक को धोने में सक्षम नहीं है। अब इस समूचे घटनाक्रम पर राजनीति शुरू हो गई है जो इस घटना से ज्यादा शर्मनाक है। राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार को तो इस घटना के रूप में ऐसा मोहरा हाथ लग गया है जिसके जरिये एक दूसरे पर सियासी हमले बोले जा रहे हैं। केंद्रीय खेल मंत्री श्री गिल जहां इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की जवाबदारी राज्य सरकार पर डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ रहे हैं तो राज्य सरकार इसे साई की असफलता के रूप में पेश कर यह दर्शाने की कोशिश कर रही है कि वह तो इस मामले में दूध की धुली है और सारा दोष इस केंद्रीय संस्था साई का ही है। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात का है कि एक वर्ग द्वारा इसका ठीकरा पीटी उषा पर फोड़ते हुए उन्हें ही इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। यह वर्ग यही सिद्ध करने में अपनी पूरी ताकत लगा रहा है कि हर कार्यक्रम में व्यवस्था का रोना रोना पीटी उषा की आदत बन गई है और भोपाल में उसका व्यवहार इसी का परिचायक है। संभव है कि उषा व्यवस्था को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हों और उनकी यह संवेदनशीलता विभिन्न अवसरों पर प्रदर्शित हुई हो लेकिन इससे उनकी उपेक्षा का अपराध तो छोटा नहीं हो जाता। यदि भारत को अंतर्राष्टï्रीय खेलकूद प्रतियोगिताओं में सबसे अधिक पदक दिलाने वाली इस एथलीट को स्वागत को लेकर कुछ पीड़ा है तो इसे हीन मानसिकता के साथ नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि इससे राज्य सरकार या साई को कुछ हासिल होने वाला नहीं है। अभी तक हुई गलतियों का परिष्कार करते हुए उषा के समुचित स्वागत सत्कार की व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि उनके गिले शिकवे दूर हो जाएं और आइंदा यह संकल्प लिया जाना चाहिए कि भविष्य में इस तरह की चूक नहीं दोहराई जाएगी। इसके साथ ही दोषी अधिकारियों पर समुचित कार्रवाई भी की जानी चाहिए।
सर्वदमन पाठक
सर्वदमन पाठक
Wednesday, September 30, 2009
मौत की त्रासदी पर प्रशासन की आपराधिक चुप्पी
भोपाल में संघ द्वारा आयोजित शस्त्र पूजन कार्यक्रम के दौरान गोली चलने से स्वयंसेवक की मौत एक ऐसी त्रासद घटना है जो अपने पीछे कुछ अनसुलझे सवाल छोड़ गई है। इस घटना की निष्पक्ष जांच के जरिये इन सवालों का उत्तर खोजा जाना निहायत जरूरी है। दरअसल इस घटना से जुड़ी तमाम परिस्थितियां इसे संदेह के दायरे में ला खड़ा करती हैं। जहां तक शस्त्र पूजन का सवाल है तो इस आयोजन में शस्त्रों की मौजूदगी कोई अनहोनी बात नहीं है लेकिन अभी तक जो बातें सामने आ रही हैं उसके अनुसार जानलेवा गोली एक गैरलायसेंसी रिवाल्वर से चली थी। घटना के समय मौजूद कुछ लोगों के अनुसार यह पिस्तौल एक भाजपा नेता की है इसका खोखा भी घटनास्थल से बरामद हुआ है। सवाल यह उठता है कि आखिर आयोजन मेें इतने अधिक लोगों के मौजूद होने के बावजूद घायल स्वयंसेवक को अस्पताल पहुंचाने में देरी कैसे हुई । मृतक स्वयंसेवक के पुत्र ने खुद आशंका व्यक्त की है कि उसके पिता की मौत हादसा नहीं बल्कि हत्या है। पुलिस इसकी तफ्तीश में जानबूझकर इन तथ्यों की अनदेखी क्यों कर रही है। स्थापना दिवस होने के कारण दशहरे का आरएसएस के लिए विशेष महत्व है और इसीलिए संघ देश भर में इस अवसर पर शस्त्र पूजन एवं पथ संचलन का आयोजन करता है। इस वर्ष भोपाल में पथ संचलन एवं शस्त्र पूजन को मनाने के लिए काफी जोर शोर से तैयारी की गई थी। संभवत: यह पहला अवसर था जब झीलों की नगरी में शस्त्र पूजन एवं पथ संचलन के लिए बाकायदा पोस्टर लगाये गए थे। इस आयोजन में परंपरागत गरिमा की अपेक्षा दिखावट को ज्यादा प्राथमिकता दी गई थी जिसका सबसे बड़ा कारण यह था कि प्रदेश में संघ इस माध्यम से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता था। चूंकि भाजपा संघ की राजनीतिक शाखा ही है अत: यह स्वाभाविक ही है कि संघ के इस शक्ति प्रदर्शन को राज्य की भाजपा सरकार का पूरा पूरा समर्थन था। इसका यह संकेत तो स्पष्टï था कि राजधानी में अन्य वर्षों की तुलना में इस बार पथ संचलन एवं शस्त्र पूजन अधिक धूमधाम से होने वाला था फिर आखिर पुलिस ने इसके लिए दोषरहित सुरक्षा प्रबंध क्यों नहीं किये। इतना ही नहीं, उक्त घटना के बाद भी पुलिस काफी देर हो जाने पर हरकत में आई। इस घटना को घटे इन पंक्तियों के लिखे जाने तक डेढ़ दिन का समय बीत चुका है लेकिन पुलिस अभी तक कमोवेश हाथ पर हाथ धरे ही बैठी है मानो कार्रवाई के पहले सरकार के इशारे का इंतजार कर रही हो। जाने क्या बात है कि पुलिस के पास कर्तव्य निष्ठïा के रूप में जो रीढ़ की हड्डïी होने चाहिए वह आजकल गायब ही दिखती है और वह सरकार के सामने नतमस्तक नजर आती है। इस मामले में पुलिस की चुप्पी यही कुछ बयान करती है। यदि पुलिस का यही हाल कायम रहा तो यह तय ही लगता है कि उक्त घटना में पुलिस की जांच सरकार एवं सरकारी दल के नेताओं के बचाव के इर्द गिर्द ही घूमेगी और इसी सर्किल में कहीं उसका निष्कर्ष बिंदु आ जाएगा।
-सर्वदमन पाठक
-सर्वदमन पाठक
Friday, September 25, 2009
अपसंस्कृति रुके, प्रदर्शन नहीं
मुख्यमंत्री की इस राय को सकारात्मक नजरिये से देखा जाना चाहिए कि प्रदर्शन के दौरान पुतला दहन की परंपरा खत्म की जानी चाहिए क्योंकि यह विरोध प्रदर्शन का असभ्यतापूर्ण तरीका है। वैसे मुख्यमंत्री का यह विचार राजनीतिक विरादरी के लिए थोड़ा आश्चर्यजनक है क्योंकि आजकल तो बिना पुतला दहन के विरोध प्रदर्शन को आव्हानकर्ता राजनीतिक दल अधूरा ही मानते हैं। शिवराज सिंह के बयान से सबसे ज्यादा आश्चर्य तो भाजपा कार्यकर्ताओं को हुआ है जिनकी पुतला दहन की लंबी चौड़ी परंपरा रही है। आज भाजपा प्रदेश में सत्ता सुख भोग रही है तब भी उसके नेता एवं कार्यकर्ता किसी न किसी बहाने से अपना यह शौक पूरा कर ही लेते हैं। आजकल भी मूल्यवृद्धि के विरोध के बहाने वे केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार के नेताओं के पुतले जलाने में मशगूल हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद भी इसके गवाह रहे हैं। अब राज्य में विपक्ष में बैठी कांग्रेस अपने विरोध प्रदर्शन को धारदार बनाने के लिए पुतला दहन का सहारा ले रही है । सच तो यह है कि विरोध का राजनीतिक कर्मकांड पुतला दहन के बिना अधूरा ही माना जाता रहा है। लेकिन मुख्यमंत्री की इस दलील में निश्चित ही काफी दम है कि पुतला दहन से जनता पर कोई असर नहीं पड़ता बल्कि यह विरोधी पक्ष के नेताओं का अपमान करने की सियासी अपसंस्कृति का ही परिचायक है। लेकिन इसका यह मतलब यह कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि विपक्ष को सरकार की नीतियों एवं फैसलों के खिलाफ उग्र विरोध प्रदर्शन का अधिकार नहीं है बल्कि विरोध प्रदर्शनों को रोकने की कोई भी कोशिश अलोकतांत्रिक कही जा सकती है। खुद भाजपा जब विपक्ष में थी तो वह किस हद तक उग्र प्रदर्शन करती थी यह उसे नहीं भूलना चाहिए। गौरतलब है कि आजकल विरोध प्रदर्शन करने वालों को सरकार की शह पर पुलिस तंत्र की बेइंतहा निर्ममता का शिकार होना पड़ता है, यह हाल के कई आंदोलनों में देखने को मिला है। इतना ही नहीं, भाजपा कार्यकर्ता भी इन विरोध प्रदर्शनों के विरोध में सड़क पर उतर आते हैं और उन्हें रोकने के बजाय पुलिस उन्हें बाकायदा संरक्षण देती है। सवाल यह भी है कि भाजपा को आज ही वे सभी आदर्श और नैतिक विचार सूझ रहे हैं जिनकी विपक्ष में रहते भाजपा ने कभी भी परवाह नहीं की। दरअसल प्रदेश की जनता के मन में जो असंतोष है, उन्हें व्यक्त करने के लिए ही वह विरोध प्रदर्शन के अधिकार का इस्तेमाल करती है। इसे राजनीतिक पूर्वाग्रह से देखना अविवेकपूर्ण है। लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों में शिष्टïता की सीमा नहीं लांघी जानी चाहिए। इस दृष्टिï से यदि सभी राजनीतिक दलों में सहमति बनती है तो पुतला दहन पर स्वैच्छिक रोक लगाई जा सकती है।
-सर्वदमन पाठक
-सर्वदमन पाठक
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