Tuesday, June 29, 2010
भोपाल गैस त्रासदी फैसला : देर भी अंधेर भी
से करीब ढाई दशक पहले हंसती गाती जिंदगी से सराबोर झीलों के शहर को आंसुओं के समुंदर में तब्दील कर देने वाली यूका मिक गैस रिसन त्रासदी के फैसले से भोपाल में गुस्से की लहर सी दौड़ गई है। यह फैसला भोपालवासियों को हत्प्रभ एवं निराश करने वाला और उसके घावों पर नमक छिड़कने वाला है। पंद्रह हजार से अधिक लोगों को मौत की नींद सुला देने और लाखों लोगों को मौत से भी बदतर जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर देने वाली विश्व की इस भयावहतम औद्योगिक दुर्घटना में आरोपी बनाए गए मौत के सौदागर पच्चीस साल के लंबे इंतजार के बाद दो साल की मामूली सजा पाएं और सिर्फ पच्चीस मिनट में जमानत पर मुक्त कर दिये जाएं, यह तो त्रासदी की पीड़ा से कराहती भोपाल की जनता की भावनाओं के साथ न्याय के नाम पर किया गया क्रूर मजाक ही है। जिन आरोपियों के हाथ हजारों लोगों के खून से रंगे हों, जिनकी वजह से लाखों लोगों की जिंदगी दोजख सी बन गई हो, जिन्हें फांसी देने की बददुआ गैस त्रासदी की हर बरसी पर गूंजती रहती हो, उन्हें इस फैसले से मिली राहत भोपालवासियों के लिए शर्म का सबब बन गई है, लेकिन यह दुनिया भर के उन तमाम लोगों के लिए भी किसी शर्मनाक हादसे से कम नहीं है, जिन्होंने खुद आगे बढ़कर भोपाल के गैसपीडि़तों की लड़ाई में समर्थन ही नहीं शिरकत भी की थी। लेकिन इसके लिए अदालत को दोषी मानना उसके साथ नाइंसाफी ही होगी, क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनी यूका के साथ पर्दे के पीछे केंद्र सरकार एवं उसके जरिये सीबीआई की घृणित मिलीभगत ही भोपाल के लोगों को इंसाफ से वंचित करने के लिए जिम्मेदार है। ऐतिहासिक घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि दुर्घटना के बाद मूलत: इस कंपनी के खिलाफ 304( पार्ट 2) के तहत मुकदमा कायम किया गया था, जिसमें आरोपियों को आजन्म कारावास का प्रावधान था, लेकिन सीबीआई ने कंपनी पर लगाई गई मूल धारा को बदलकर धारा 304(ए) कर दिया, जिसके बाद न्यायालय के हाथ बंध गए क्योंकि नई धारा के तहत दो साल से ज्यादा की सजा का प्रावधान ही नहीं था। चूंकि यह विश्वास करना मुश्किल है कि सीबीआई केंद्र सरकार के इशारे के बिना यह जुर्रत कर सकती है इसलिए यह निष्कर्ष स्वाभाविक ही है कि बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ केंद्र की साठगांठ का इस फैसले में अहम रोल रहा है। यह साठगांठ भोपाल के गैस पीडि़तों को मिलने वाले मुआवजे में कटौती के रूप में भी सामने आई है। ठ्ठ शेष पृष्ठï 9 परतिस पर केंद्रीय कानून मंत्री का यह बयान गैसपीडि़तों को व्यंगबाण जैसा लगता है जिसमें वह कहते हैैं कि भोपाल में न्याय दफन हो गया है।यह फैसला मौत के सौदागरों को उनके किये की पूरी पूरी सजा दिलाने की गैसपीडि़तों की न्यायपूर्ण इच्छा का गला घोंटता है और इस फैसले को गैस पीडि़तों ने ऊंची अदालत में चुनौती देने का जो निर्णय लिया है, वह इस बात का परिचायक है कि गैसपीडि़त न्याय की इस लड़ाई को तार्किक परिणति तक पहुंचाने के लिए कृतसंकल्प हैं। यूनियन कार्बाइड के खिलाफ इंसाफ की इस जंग में कामयाबी इसलिए भी जरूरी है ताकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा उन्हें संरक्षण देने वाली विश्व की बड़ी शक्तियों के हाथों राष्टï्रीय हितों को गिरवी रखने वाली सरकारों एवं उनके ध्वजवाहक नेताओं को बेनकाब किया जा सके और देश को इस दुष्चक्र से मुक्ति दिलाई जा सके। बहरहाल गैसपीडि़तों के पीठ पर बहुराष्टï्रीय कंपनियों के साथ साजिश रचकर जिन जयचंदी ताकतों ने छुरा भोंका है, भोपाल शायद उन्हें कभी माफ नही कर सकेगा।-सर्वदमन पाठक
मध्याह्नï भोजन में छिपकली!
प्रदेश में आंगनबाड़ी के बच्चों को दिये जाने वाले भोजन में किस कदर जानलेवा लापरवाही बरती जाती है, सतना में हुई घटना इस बात की ही गवाही देती है। इस घटना के तहत सतना की एक आंगनबाड़ी में पढऩे वाले बच्चों को दूषित और संभवत: विषाक्त खीर परोस दी गई जिससे उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। आंगनबाड़ी की बच्चियों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस खीर को बनाने में इस कदर लापरवाही बरती गई कि खीर में एक छिपकली पक गई और इसी खीर को बच्चों को परोस दिया गया। इसका हश्र यह हुआ कि बच्चों को जान के लाले पड़ गए और अस्पताल में भरती करने पर ही इन बच्चों पर से यह संकट टल सका। ऐसी ही एक घटना श्योपुर जिले में हुई जहां दूषित पोहा आंगनबाड़ी के बच्चों को परोस दिया गया और इससे बीमार हुए कुछ बच्चों का एक निजी चिकित्सालय में उपचार किया गया तब उनकी हालत में सुधार हो सका। दूषित भोजन आंगनबाड़ी में परोसे जाने के मामले अन्य आंगनबाड़ी में भी सामने आए हैैं। ये मामले विरले नहीं है बल्कि पिछले वर्षों में जब तब मध्यान्ह भोज में दूषित एवं विषाक्त खाना परोसे जाने की शिकायतें आती रही हैैं। गांवों एवं दूरदराज के इलाकों मेंं तो ये शिकायतें आम ही हैैं लेकिन राजधानी एवं उसके आसपास के स्कूल एवं आंगनबाडिय़ों में भी इस तरह की कई खबरें अखबारों एवं न्यूज चैनलों की सुर्खियां बनी हैैं जहां प्रदेश सरकार एवं प्रशासन के आला अफसर सतत मौजूद रहते हैैं। कमोवेश हर बार ऐसी घटनाएं सामने आने पर जांच की घोषणा की जाती है और जांच की औपचारिकता भी की जाती है लेकिन फिर इनकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है और ये घटनाएं नए सिरे से होने लगती है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि या तो मध्यान्ह भोजन योजना से जुड़े लोगों को राजनीतिक नेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त होता है या फिर उन्हें बचाने के लिए नेता एवं अफसर सक्रिय हो जाते हैैं। लेकिन मध्यान्ह भोजन में धांधली एक सामाजिक अपराध ही है और इसे इसी नजर से देखा जाना चाहिए। सरकार को ऐसी घटनाओं पर काफी सख्त रुख अपनाना चाहिए और इन घटनाओं की गहराई से जांच करा कर उनमें उत्तरदायी व्यक्तियों पर कठोर कार्रवाई करना चाहिए क्योंकि ऐसी घटनाओं से सरकारी योजनाओं के प्रति लोगों में भरोसा घटता है। जब तक सरकार मध्यान्ह भोजन में गड़बड़ी करने वालों पर ऐसे दंड की कार्रवाई नहीं करता जो अन्य लोगों के लिए भी नजीर बने तब तक इन पर अंकुश लगना नामुमकिन ही होगा और सरकार इस योजना की नाकामी के दायरे में आती रहेगी।-सर्वदमन पाठक
जरूरत है ऐसे और धमाकों की?
भोपाल के मोतिया तालाब मार्ग पर अवैध रूप से बनाई गई एक इमारत की दो मंजिलों को उड़ाने के लिए किया गया धमाका जिस तरह से मीडिया की सुर्खियों में है, उससे यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि यह नगर निगम की भारी भरकम उपलब्धि है। लेकिन वास्तविकता कुछ और है। वैसे एक अपुष्टï सी खबर यह भी है कि इस बिल्डिंग के मालिक से नगर निगम अधिकारियों का सौदा नहीं पट पाया क्योंकि नगर निगम की गतिविधियों से दूर से वाकिफ लोगों को भी पता है कि यहां पैसे से कोई भी काम कराया जा सकता है। लोग इस घटना पर चुटकियां लेते हुए सुने जा सकते हैं कि शायद अधिकारियों की मांग कुछ ज्यादा रही होगी और इमारत के मालिक को यह कल्पना नहीं रही होगी कि नगर निगम उसकी बिल्डिंग की ही ऊपरी मंजिलों को धराशायी कर देगा। बहरहाल यदि नगर निगम ने अवैध निर्माण के खिलाफ इतना दुस्साहसिक कदम उठाया है तो वह बधाई एवं सराहना का पात्र है लेकिन क्या नगर निगम इस बात का स्पष्टï आश्वासन दे सकता है कि यह कार्रवाई अपने अंजाम तक पहुंचने तक लगातार जारी रहेगी। यह ऐसी शुरुआत है जिसे अंजाम पहुंचाना भोपाल के विकास ही नहीं, पर्यावरण के लिए भी जरूरी है। गौरतलब है कि करीब डेढ़-दो दशक पहले सिद्दीक हसन तालाब नंबर 2 का अस्तित्व हुआ करता था और बरसात की ऋतु में तो इसमें उठती लहरें वहां से गुजरने वाले लोगों को आनंदित करती थीं लेकिन भूमाफियाओं ने साजिश के तहत इसमें जल कुंभी उगाकर इसके अस्तित्व को ही खत्म कर दिया और फिर इस तालाब को पूरकर उसमें इमारतें बना दी तथा भारी भरकम दामों में उन्हें बेच दिया। इससे इस क्षेत्र के पर्यावरण को जो क्षति पहुंची है, वह अपूरणीय ही है। नगर निगम एक्ट 1956 के तहत नदी, तालाब, कुए बावडिय़ों जैसे जल स्रोतों को सार्वजनिक संपत्ति माना गया है। इसके बावजूद सिद्दीक हसन तालाब की इस खामोश मौत पर राज्य सरकार एवं नगर निगम की सोची समझी चुप्पी उनके इरादों को शक के दायरे में खड़ा करती है। जहां तक अवैध निर्माण की बात है, न केवल इस क्षेत्र में बल्कि पूरे शहर में ही पिछले कुछ समय से अवैध निर्माण की बाढ़ आ गई है और नगर निगम की आंखों में बंधी पट्टïी खुलने का नाम ही नहीं लेती। दरअसल शहर में इन अवैध निर्माणकर्ताओं का हौसला इसलिए बढ़ गया है क्योंकि इन्हें कहीं न कहीं सरकार तथा सत्तारूढ़ दल से जुड़े नेताओं तथा कुछ भ्रष्टï नौकरशाहों का उन्हें संरक्षण प्राप्त है। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में तो खुद राज्य के मंत्री एवं विधायक ही सीधे या परोक्ष रूप से अवैध कालोनियों के निर्माण मेंं लिप्त हैं। मसलन कोलार क्षेत्र में सत्तारूढ़ दल के एक विधायक द्वारा बड़े पैमाने पर कोलार बांध के निकट अवैध निर्माण किया जा रहा है। यह सिर्फ एक बानगी है जो यही संकेत देती है कि भोपाल शहर में इस तरह के अवैध निर्माण अंधाधुंध तरीके से जारी हैं और अभी तक तो उन पर कोई सिलसिलेवार कार्रवाई नहीं की जा सकी है। ऐसे में सवाल यही है कि क्या ऐसे विधायकों तथा नेताओं से टकराने और उनके अवैध निर्माण को तोडऩे का साहस नगर निगम में है। इस मामले में राज्य सरकार को भी उसके उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि अवैध रूप से निर्माणाधीन भवनों तथा कालोनियों का काला कारोबार राजनीतिक हस्तक्षेप को समाप्त किये नहीं रोका जा सकता और राज्य सरकार की इच्छा शक्ति के बिना यह संभव नहीं है। खुद मुख्यमंत्री की एक ईमानदार राजनीतिज्ञ के रूप में प्रतिष्ठïा है अत: उम्मीद की जानी चाहिए कि वे इस दुष्चक्र को तोडऩे के लिए पर्याप्त इच्छाशक्ति का परिचय देंगे और भोपाल के विकास में सार्थक नेतृत्व प्रदान करेंगे।
सर्वदमन पाठक
सर्वदमन पाठक
Friday, February 5, 2010
मध्यप्रदेश में भी चलाया जाएभ्रष्टïाचार के खिलाफ ब्रह्मïास्त्रअपनी ईमानदार छवि के लिए पहचाने जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने देश के विकास और खुशहाली को निगल रहे भ्रष्टïाचार पर अपना ब्रह्मïास्त्र चला दिया है। मंत्रियों एवं मुख्यमंत्रियों को लिखे तदाशय के पत्र में उन्होंने इस सिलसिले में जो उपाय सुझाए हैं, वे मंत्री स्तरीय भ्रष्टïाचार के खिलाफ एक सशक्त मोर्चेबंदी माने जा सकते हैं और यदि बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के इसका शब्दश: पालन किया जाए तो भ्रष्टïाचार नियंत्रण में यह एक दूरगामी कदम सिद्ध हो सकता है। उन्होंने सभी मंत्रियों- मुख्यमंत्रियों से उनकी तथा उनके सगे संबंधियों की चल अचल संपत्ति व व्यावयायिक हितों का खुलासा करने के लिए कहा है। लायसेंस, परमिट और लीज कबाडऩे में जुटे रहने वाले व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के साथ साठगांठ के मामले में अतीत में कई मंत्री भी दागदार रहे हैं। इस दृष्टिï से ऐसे प्रतिष्ठïानों से ताल्लुक न रखने की प्रधानमंत्री की सलाह भी काफी वजन रखती है। उपहार के जरिये भ्रष्टïाचार की फल फूल रही परंपरा पर प्रभावी अंकुश लगाने की गरज से उन्होंने इन मंत्रियों- मुख्यमंत्रियों को लगे हाथों यह नायाब सलाह भी दे डाली है कि वे अपने करीबी रिश्तेदारों को छ$ोड़कर अन्य किसी से भी तोहफे कबूल न करें। इसके साथ ही मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में कई आला अफसरों पर आयकर के छापों से केंद्र ने यह संकेत भी दिया है कि भ्रष्टïाचारी नौकरशाहों की भी अब खैर नहीं है। प्रधानमंत्री की इस सार्थक पहल ने अन्य राज्यों के लिए एक ऐसी मिसाल पेश की है जो अन्य राज्यों के लिए भी अनुकरणीय हो सकती है। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में जहां पिछली तथा वर्तमान सरकारों के कई कद्दावर मंत्रियों तक पर भ्रष्टïाचार के गंभीर आरोप लग चुके हैं, ऐसी प्रभावी मुहिम वक्त का तकाजा है। प्रधानमंत्री की तरह राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की ईमानदार छवि एवं निष्कंटक नेतृत्व ऐसी मुहिम में उनकी ताकत बन सकता है। शिवराज सिंह प्रधानमंत्री के इस पत्र की ही तर्ज पर राज्य में मंत्रियों के भ्रष्टïाचार पर नकेल कसने की प्रभावी कवायद करें तो जहां एक ओर उनकी सरकार के जनकल्याणकारी कार्यों को गति मिलेगी वहीं उनके नेतृत्व में जनविश्वास बढ़ेगा। शर्त यही है कि इस मुहिम के लिए बिना किसी भेदभाव के चलाया जाए। उसके लिए बाकायदा एक सुनियोजित रणनीति बनाई जानी चाहिए और उसपर प्रभावी तरीके से अमल किया जाए। इस रणनीति के शुरुआती चरण में मंत्रियों एवं उनके करीबी रिश्तेदारों की चल अचल संपत्ति की समयबद्ध घोषणा अनिवार्य की जाए और उनका मूल्यांकन भी किया जाए। लेकिन इसके साथ ही उन तमाम माध्यमों पर भी पाबंदी लगाई जानी चाहिए जिनके जरिये मंत्री बेशुमार दौलत हासिल कर कुछ ही समय में समृद्धि के झूले में झूलने लगते हैं। बिना नौकरशाहों के सहयोग के मंत्रियों के भ्रष्टïाचार की कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि रातोंरात संपन्नता की मंत्रियों की महत्वाकांक्षाओं को रास्ता यही नौकरशाह दिखाते हैं। नौकरशाहों की आलीशान कोठियां और व्यवसायों में इनकी हिस्सेदारी की छानबीन से यह आसानी से सिद्ध हो सकता है कि भ्रष्टïाचार के इस खेल में वे भी उतने ही बड़े खिलाड़ी हंै। इसलिए भ्रष्टï नौकरशाहों की जांच एवं उनपर समुचित कार्रवाई सरकार एवं प्रशासन दोनों के आचरण के शुद्धीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। सिर्फ सरकार के भरोसे राज्य में भ्रष्टïाचार मुक्त शासन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसके लिए सत्तारूढ़ पार्टी को भी आगे आना होगा और उन सभी मंत्रियों को यह साफ संकेत देना होगा कि यदि उन्होंने अपने तौर तरीके नहीं बदले तो उनका राजनीतिक केरियर अंधकार में पड़ सकता है।हमें यह खुशफहमी हो सकती है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और हम अपने वोटों की ताकत से सरकारें चुनने और उनके जरिये देश की तकदीर बदलने की ताकत रखते हैं लेकिन त्रासद तथ्य यही है कि हम चुनाव तक हमारी गणेश परिक्रमा करने वाले ये नेता सत्ता पाते ही हम मतदाताओं को भूल जाते हैं और विकास की मद में स्वीकृत होने वाली अधिकांश राशि भ्रष्टïाचार के जरिये इनकी तिजोरियों में जमा होती रहती है। परिणाम यह होता है कि हम विकास एवं खुशहाली को तरसते हुए अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं। भ्रष्टïाचार की बहती गंगा में डुबकी लगाने वालों में सरकारी मंत्री या सत्तारुढ़ दल के विधायक व नेता ही नहीं बल्कि आला अफसर भी पूरे श्रद्धाभाव से शामिल होते हैं। देश प्रदेश के सार्थक विकास के लिए सरकार के आचरण को संदेह के दायरे से मुक्त करना प्रकारांतर से लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करना ही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार की तरह राज्य सरकार भी भ्रष्टïाचार मुक्ति के यज्ञ में अपनी हिस्सेदारी का परिचय देगी।
-सर्वदमन पाठक
-सर्वदमन पाठक
Thursday, February 4, 2010
सिर्फ चिंता नहीं बल्कि कार्रवाई से मिटेगा भ्रष्टïाचार
यह कोई रहस्य नहीं है कि सरकारों द्वारा आम तौर पर तो जनता के हितों की रक्षा की कसमें खाई जाती हैं और सरकारी नीतियों एवं कार्यक्रमों में इसका भरपूर दिखावा भी किया जाता है कि उनका उद्देश्य सिर्फ आम आदमी का कल्याण ही है लेकिन वास्तविकता यह है कि भ्रष्टïाचार के कारण इन कार्यक्रमों के लिए निर्धारित बजट का काफी छोटा हिस्सा ही इसमें इस्तेमाल हो पाता है और बाकी हिस्से की राशि नौकरशाहों तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा बंदरबांट कर ली जाती है। इसका स्वाभाविक परिणाम यही होता है कि मंत्री, विधायक तथा सत्ता से जुड़े तमाम नेताओं के साथ ही आला अफसरों की तिजोरियां भ्रष्टïाचार की इस धनराशि से लगातार भरती रहती हैं और वे संपन्नता की जिंदगी जीते हैं जबकि प्रदेश की आम जनता विकास के लाभ से वंचित रहती है और बदहाली एवं कंगाली का जीवन जीना उसकी मजबूरी होती है। भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने भोपाल दौरे के दौरान नगरीय निकायों के निर्वाचित पदाधिकारियों के सम्मेलन में जनप्रतिनिधियों द्वारा किये जाने वाले भ्रष्टïाचार पर चिंता जता कर इसी समस्या की ओर संकेत किया है। उन्होंने इन जनप्रतिनिधियों को इस मामले में आगाह करते हुए कहा कि वे यदि खुद भ्रष्टï होंगे तो वे अन्यों के भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा पाएंगे। इस सम्मेलन में अन्य प्रादेशिक कद्दावर भाजपा नेताओं ने चिंता की इस बहती गंगा में हाथ धोकर यह दिखाने का भरपूर प्रयास किया कि वे खुद नैतिकता के कितने बड़े हिमायती हैं। इस सम्मेलन में निष्ठïा एवं सेवा का पाठ भी इन जनप्रतिनिधियों को भरपूर पढ़ाया गया। यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है कि आड़वाणी के इस भाषण से ये जनप्रतिनिधि नैतिकता एवं जनसेवा के लिए किस हद तक संकल्पबद्ध होते हैं और राज्य की भाजपा सरकार भ्रष्टाचार पर आड़वाणी की इस ंिचंता को खुद कितनी गंभीरता से लेती है लेकिन केंद्र सरकार ने शायद आड़वाणी की चिंता को कहीं ज्यादा संजीदगी से ले लिया है। जहां तक नौकरशाही का सवाल है, केंद्र सरकार ने उनके भ्रष्टïाचार को नियंत्रित करने का काम शुरू कर दिया है। अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के लिए केंद्र सरकार ने अचल संपत्ति का ब्योरा देना अनिवार्य कर दिया है। लेकिन भ्रष्टïाचार के नियंत्रण के लिए यह एक छोटा सा कदम है। दरअसल इसमें अन्य अधिकारियों तथा राजनीतिक नेताओं के भ्रष्टïाचार पर अंकुश लगाना बहुत ही जरूरी है। केंद्र सरकार को हर मंत्री एवं सांसद की संपत्ति का वार्षिक ब्योरा सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध कराने की पहल करनी चाहिए। इस मामले में राज्य की भाजपा सरकार को भी अपनी जवाबदेही निभानी होगी और यह सिद्ध करना होगा कि वह सिर्फ जुबानी जमाखर्च नहीं करती बल्कि ठोस कदम भी उठाती है। गौरतलब है कि पहले यह प्रावधान था कि राज्य के मंत्रियों को अपनी संपत्ति का वार्षिक ब्योरा प्रस्तुत करना होगा लेकिन शिवराज सिंह के पिछले कार्यकाल में इस प्रावधान को शिथिल कर दिया गया था। अब राज्य सरकार को इस प्रावधान को सख्ती से लागू करना चाहिए ताकि वह इस मामले में पारदर्शिता का दावा कर सके। भाजपा यदि वास्तव में जनविश्वास की कसौटी पर खरी उतरना चाहती है तो उसे राजनीति में नैतिकता एवं ईमानदारी के लिए संकल्पबद्धता दिखानी होगी ताकि जन कल्याण के लिए बनाये जाने वाले कार्यक्रमों का लाभ जनता को मिल सके।
-सर्वदमन पाठक
-सर्वदमन पाठक
Wednesday, February 3, 2010
कही-अनकही
इनका कहना है-
शिवसेना की यह थ्योरी खतरनाक है कि मुंबई सिर्फ महाराष्टिï्रयनों की है। देश की यह आर्थिक राजधानी सभी की है और सभी भारतवासियों को मुंबई में रहने और वहां काम करने का हक है। आईपीएल में भाग लेने वाले आस्ट्रेलियाई एवं पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को शिवसेना की धमकी के परिप्रेक्ष्य में उन्हें केंद्र पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देता है।पी चिदंबरम, केंद्रीय गृहमंत्री..........................................
मुंबई सभी भारतवासियों की है। समूचा भारत सभी भारतवासियों का है और वे कहीं भी जाकर अपनी आजीविका कमा सकते हैं। हमारी भाषा, जाति, उपजाति अथवा जनजाति अलग अलग हो सकती है लेकिन हम सभी भारतमाता के पुत्र हैं। यह धारणा गलत है कि बाहरी लोगों के कारण महाराष्टï्र में नौकरियां कम हो गई हैं और इसका समाधान अवश्य निकाला जाना चाहिए लेकिन इसका यह समाधान कतई नहीं है कि बाहरी लोगों यहां आने से रोक दिया जाए।
मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ
............................
मुंबई मराठी मानुस की है। राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ महाराष्टï्र की राजधानी के बारे में कोई दखलंदाजी न करे और हमें देशभक्ति एवं राष्टï्रीय एकता का पाठ न पढ़ाये। मुंबई के 92 के दंगों के दौरान हिंदुओं की रक्षा शिवसेना ने ही की थी, उस समय संघ कहां था।उद्धव ठाकरे, कार्यकारी अध्यक्ष शिवसेना
.......................
लोग क्या सोचते हैं?
यह विचार ही अलगाववादी सोच का प्रतीक है कि मुंबई सिर्फ मराठियों की है। दरअसल मुंबई देश का ही एक हिस्सा है और संविधान के अनुसार देश के अन्य हिस्सों की तरह मुंबई में भी किसी भी देशवासी को रहने और आजीविका कमाने का हक है। आजकल विश्व में सबसे खूबसूरत एव समृद्ध शहरों में शुमार मुंबई के वर्तमान स्वरूप के निर्माण में सिर्फ मुंबईवासियों ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले भारतीयों की मेधा तथा खून पसीने का भी काफी बड़ा योगदान है। शिवसेना अपने स्थापनाकाल से ही वोटों की राजनीति के कारण खुद को मराठियों के सबसे बड़े हितरक्षक के रूप में प्रचारित करती रही है लेकिन अब परिस्थतियां बदल चुकी हैं और शिवसेना को शायद यह अंदाजा नहीं है कि मुंबई का जनसंख्यात्मक स्वरूप इतना बदल गया है कि सिर्फ मराठियों के हित की बात करने से उसे राजनीतिक हानि के अलावा और कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इतना ही नहीं, अब उनके ही भतीजे के नेतृत्व में बनी महाराष्टï्र नवनिर्माण सेना भी शिवसेना की ही तर्ज पर मराठी वोट बैंक की राजनीति कर रही है जिसकी वजह से इस वोट बैंक में भी खासा विभाजन हो चुका है। शिवसेना को यदि अपने राजनीतिक उत्कर्ष को पुन: प्राप्त करना है तो उसे अब सर्वग्राही राजनीति करनी होगी तभी वह मुंबई सहित महाराष्टï्र में अपनी राजनीतिक पताका फहरा सकेगी अत: मुंबई,महाराष्टï्र एवं समूचे राष्टï्र ही नहीं बल्कि खुद के हित में शिवसेना को अपना नजरिया बदलना चाहिए और मुंबई के सिलसिले में अपनी उक्त हठधर्मिता को छोड़ देना चाहिए।
शिवसेना की यह थ्योरी खतरनाक है कि मुंबई सिर्फ महाराष्टिï्रयनों की है। देश की यह आर्थिक राजधानी सभी की है और सभी भारतवासियों को मुंबई में रहने और वहां काम करने का हक है। आईपीएल में भाग लेने वाले आस्ट्रेलियाई एवं पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को शिवसेना की धमकी के परिप्रेक्ष्य में उन्हें केंद्र पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देता है।पी चिदंबरम, केंद्रीय गृहमंत्री..........................................
मुंबई सभी भारतवासियों की है। समूचा भारत सभी भारतवासियों का है और वे कहीं भी जाकर अपनी आजीविका कमा सकते हैं। हमारी भाषा, जाति, उपजाति अथवा जनजाति अलग अलग हो सकती है लेकिन हम सभी भारतमाता के पुत्र हैं। यह धारणा गलत है कि बाहरी लोगों के कारण महाराष्टï्र में नौकरियां कम हो गई हैं और इसका समाधान अवश्य निकाला जाना चाहिए लेकिन इसका यह समाधान कतई नहीं है कि बाहरी लोगों यहां आने से रोक दिया जाए।
मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ
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मुंबई मराठी मानुस की है। राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ महाराष्टï्र की राजधानी के बारे में कोई दखलंदाजी न करे और हमें देशभक्ति एवं राष्टï्रीय एकता का पाठ न पढ़ाये। मुंबई के 92 के दंगों के दौरान हिंदुओं की रक्षा शिवसेना ने ही की थी, उस समय संघ कहां था।उद्धव ठाकरे, कार्यकारी अध्यक्ष शिवसेना
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लोग क्या सोचते हैं?
यह विचार ही अलगाववादी सोच का प्रतीक है कि मुंबई सिर्फ मराठियों की है। दरअसल मुंबई देश का ही एक हिस्सा है और संविधान के अनुसार देश के अन्य हिस्सों की तरह मुंबई में भी किसी भी देशवासी को रहने और आजीविका कमाने का हक है। आजकल विश्व में सबसे खूबसूरत एव समृद्ध शहरों में शुमार मुंबई के वर्तमान स्वरूप के निर्माण में सिर्फ मुंबईवासियों ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले भारतीयों की मेधा तथा खून पसीने का भी काफी बड़ा योगदान है। शिवसेना अपने स्थापनाकाल से ही वोटों की राजनीति के कारण खुद को मराठियों के सबसे बड़े हितरक्षक के रूप में प्रचारित करती रही है लेकिन अब परिस्थतियां बदल चुकी हैं और शिवसेना को शायद यह अंदाजा नहीं है कि मुंबई का जनसंख्यात्मक स्वरूप इतना बदल गया है कि सिर्फ मराठियों के हित की बात करने से उसे राजनीतिक हानि के अलावा और कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इतना ही नहीं, अब उनके ही भतीजे के नेतृत्व में बनी महाराष्टï्र नवनिर्माण सेना भी शिवसेना की ही तर्ज पर मराठी वोट बैंक की राजनीति कर रही है जिसकी वजह से इस वोट बैंक में भी खासा विभाजन हो चुका है। शिवसेना को यदि अपने राजनीतिक उत्कर्ष को पुन: प्राप्त करना है तो उसे अब सर्वग्राही राजनीति करनी होगी तभी वह मुंबई सहित महाराष्टï्र में अपनी राजनीतिक पताका फहरा सकेगी अत: मुंबई,महाराष्टï्र एवं समूचे राष्टï्र ही नहीं बल्कि खुद के हित में शिवसेना को अपना नजरिया बदलना चाहिए और मुंबई के सिलसिले में अपनी उक्त हठधर्मिता को छोड़ देना चाहिए।
Monday, February 1, 2010
शिवराज की प्रशंसनीय पहल
मध्यप्रदेश अपनी नैर्सिर्गक संपदा तथा सांस्कृतिक वैविध्य के लिए विशेष पहचान रखता है। लेकिन यह भी सच है कि इसी वैविध्य को क्षुद्र राजनीतिक लाभ के लिए कुछ राजनीतिक नेताओं एवं दलों ने जब तब इस्तेमाल किया है जबकि यह प्रदेश की अनेकता एवं एकता का माध्यम बनना चाहिए था। इस सिलसिले में गणतंत्र दिवस से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह द्वारा शुरू कई मध्यप्रदेश बनाओ यात्रा काफी महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। उनका यह अभियान प्रदेश की एकजुटता एवं समृद्धि को पारस्परिक रूप से गूंथने का प्रयास ही है। इस मामले में यात्रा की शुरुआत के लिए स्थान का चयन भी काफी सूझबूझ भरा है। मंडला का अपना एक गौरवशाली इतिहास है। इसकी मिट्टïी में आजादी की सुगंध घुली हुई है। गढ़ मंडले की रानी दुर्गावती की बहादुरी की गाथाएं यहां के पत्थरों पर अंकित हैं। गोंड़ राजाओं का यह राज्य उनके ऐतिहासिक वैभव का परिचायक है। लेकिन इस क्षेत्र में वैगा जनजाति की काफी बड़ी आबादी है। किसी भी प्रदेश को उसका सांस्कृतिक स्वाभिमान तथा सांस्कृतिक एकजुटता ही समृद्धि की राह पर ले जाती है। मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश बनाओ यात्रा में इन्हीं उपादानों को अपना जरिया बनाया है। उन्होंने मध्यप्रदेश की संस्कृति की अजस्र धारा की प्रतीक जीवनदायिनी नर्मदा के उद्गम तीर्थ अमरकंटक पर मां नर्मदे की पूजा अर्चना कर इसे अनूठी शुरुआत दी और लोकतंत्र की भावना के अनुरूप जनता को विभिन्न निर्माण एवं विकास कार्यों में सीधी भागीदारी का आमंत्रण दिया। इस मौके पर नर्मदा को प्रदूषण मुक्त करने के अभियान में उन्होंने भागीदारी की और अमरकंटक विकास प्राधिकरण बनाने की घोषणा की। उन्होंने जब यह आव्हान किया कि जनता को खुद अपने परिवार, गांव और प्रदेश की जरूरत समझ कर उसमें आगे आकर सहयोग करना होगा तो वे प्रकारांतर से इस अभियान को लोकतंत्र का यज्ञ बनाने की ही पहल कर रहे थे। स्वच्छता, पर्यावरण, नशामुक्ति, जल संचय जैसे आम आदमी के दूरगामी हित के कार्यों में उन्होंने जनता से सक्रिय भागीदारी करने का आव्हान किया जो लोकतंत्र में उनकी गहन आस्था को ही दर्शाता है। लेकिन साथ ही प्रदेश को भूमाफिया सहित सभी प्रकार के माफियाओं से निजात दिलाने एवं वर्ष 2013 तक प्रदेश के सभी गांवों को बारहमासी सड़कों से जोडऩे जैसे उनके संकल्पों ने यह भी जताया कि सरकार खुद भी मध्यप्रदेश बनाओ अभियान में अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने वाली नहीं है। मुख्यमंत्री का यह अभियान एक अच्छी शुरुआत है जिसे यदि सुदृढ़ कदमों के साथ आगे बढ़ाया जाए तो यह प्रदेश के विकास में दूरगामी भूमिका निभा सकता है लेकिन सवाल यही है कि क्या नौकरशाही एवं समूची सरकार इसमें अपनी भूमिका समुचित तरीके से निभाएगी और क्या सरकार इस पर समुचित नियंत्रण रख पाएगी। - सर्वदमन पाठक
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