Thursday, August 22, 2019

बासित की इस हरकत पर कोई भारतीय भरोसा नहीं करेगा

शोभा डे ब्लॉग से


मैैं एक शानदार होटल में आनंदिता के साथ कैपुसिनो की चुस्कियां ले रही हूं। यह मां-बेटी के साथ समय बिताने का भव्य अवसर है। हम लोग चर्चा कर रहे हैैं कि और क्या मंगाया जाए। तभी मेरा सेल फोन लगातार बजने लगता है। तभी एक मित्र रिपोर्टर मुझे इस संबंधी जानकारी उपलब्ध कराते हैैं। वे बताते हैैं कि भारत- स्थित पूर्व पाकिस्तानी हाई कमिश्नर अब्दुल बासित ने अपने देश के एक ब्लॉगर को दिये इंटरव्यू में दावा किया है कि उसने कश्मीर मुद्दे पर एक विशेष तरह का (पाकिस्तान समर्थक)लेख लिखने के लिए मुझे प्रभावित किया था। उसने मेरे कॉलम में लिखे गए कुछ हिस्सों को उद्धृत करते हुए इस लेख का श्रेय खुद को दिया है। मेरा पहला रिस्पांस यह था कि मैैं इस मामले को पूरी तरह खारिज करूं और इस पर खास तौर पर ट्रोल आर्मी द्वारा की जा रही गंदी तथा धमकी भरी टिप्पणियों पर आगे कोई प्रतिक्रिया नहीं दूं। लेकिन इस तरह के    कॉल्स मेरे पास आते चले गए तो मुझे लगा कि यह क्या हो रहा है? यह अब्दुल बासित कौन है और किस बारे में बात कर रहा है? दरअसल 27 जनवरी 2019 को जयपुर के रामबाग पैलेस होटल के लॉन में आयोजित एक साहित्योत्सव के स्वागत समारोह में मैैंने अपने पति के साथ हिस्सा लिया था। हम लोग अपने कुछ मित्रों, जिनमें लेखक, प्रकाशक तथा संपादक शामिल थे, के साथ गपशप कर रहे थे तभी अचानक व्हिस्की का टंबलर लिए हुए एक व्यक्ति वहां आ गया और कुछ ज्यादा ही दोस्ताना अंदाज में हम लोगों के साथ बातचीत करने लगा। कुछ समय बाद हम लोगों के समूह की गुस्से भरी बातों को सुनकर वह सिर झुकाकर वहां से चला गया। हम लोगों के बीच कुल तीन मिनिट की बात हुई। यह मेरी और बासित की पहली और अंतिम मुलाकात थी। और उसकी हिमाकत देखिये कि आज वह मुझे 'इंफ्लुएंसÓ करने की बात कर रहा है। वह झूठ बोल रहा है। वह संबंधित वीडियो में जिस कॉलम की बात कर रहा है, वह 2016 में लिखा गया था। अपने मुंह से बकवास करने के पहले उसने अपना होमवर्क तो सही तरीके से कर लिया होता।
सवाल यह है कि फिर मैैं यह प्रतिक्रिया क्यों दे रही हूं? इसकी वजह यह है कि इस सिलसिले में अपना दामन साफ रखना महत्वपूर्ण है। उसका आरोप गंभीर और खतरनाक है। मेरी चुप्पी का यह मतलब होगा कि मैैं उसके असत्य को चुनौती देने की इच्छा नहीं रखती। इसलिए एएनआई के अनुरोध पर मैैंने एक मिनिट के वीडियो में अपनी प्रतिक्रिया दी जिसे भीड़ भरे मॉल में आनंदिता ने शूट किया। इसके बाद तो ट्रोल आर्मी और सक्रिय हो गई। मुझे बताया गया कि मेरा नाम भारत के उन 300 लेखकों, चिंतकों में शामिल है जो आईएसआई के 'पे रोलÓ पर हैैं। ये लोग पाकिस्तान के लिए काम करते हैैं और भारत विरोधी नीतियों का समर्थन करते हैैं। ये आरोप काफी विस्फोटक हैैं और इन आरोपों का पूरी ताकत से खंडन किया जाना चाहिए। हकीकत यह है कि धारा 370 के मुद्दे पर विश्व का जनमत पाकिस्तान के खिलाफ है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री महमूद कुरैशी तक को यह स्वीकार करना पड़ा है कि पाकिस्तान के लोग मूर्खों की दुनिया में रह रहे हैैं। बासित ने सोचा होगा कि जब पाकिस्तान की विश्वसनीयता बुरी तरह गिर गई है, तो वह अचानक मेरा नाम उछालकर लोगों का ध्यान वास्तविकता से भटका देगा। लेकिन ऐसा हो नहीं सकेगा। मुझ पर कई आरोप लग सकते हैैं लेकिन किसी ने भारत के प्रति मेरी निष्ठा को कभी चुनौती नहीं दी। हां, यह सच है कि मेरा व्यक्तित्व और विचार स्वतंत्र हैैं लेकिन मैैं किसी राजनीतिक दल से चुड़ी नहीं हूं। मैैं जो महसूस करती हूं, वही कहती हूं। यह मेरा अधिकार है कि मैैं विचारों के मुताबिक किसी सरकार को चुनौती दूं या उसकी आलोचना करूं, चाहे कोई भी सरकार सत्ता में हो। यह एक नागरिक का विशेषाधिकार है और मैं इसे छोड़ नहीं सकती, चाहे जो भी हो। लेकिन यह अब्दुल बासित मुझे डिसक्रेडिट करने वाला कौन होता है। कौन इस झूठे व्यक्ति पर भरोसा करेगा। मेरे विचार खुले हैैं और यह सभी को मालूम है। मेरे फोन टेप करो, मेरे ईमेल हैक करो, जब भी मैैं बाहर निकलूं तो मेरा पीछा करो, सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर मेरी बातों की छानबीन करो, मेरा लैपटॉप ले लो लेकिन मेरे शर्मिंदा होने या मुंह छिपाने लायक इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा। इसलिए अब्दुल बासित, तुमने गलत महिला से पंगा लिया है। तुम्हारी बात पर कोई भी भरोसा नहीं करेगा। इससे अच्छा होता कि तुम अपने देश पर ध्यान देते कि वहां क्या गड़बड़ी हो रही है। देश किसी भी राजनीतिक पार्टी सेे शक्तिशाली है और मैैं जिन बातों पर भरोसा करती हूं, उनके लिए पूरी शिद्दत से लड़ती रहूंगी। अब्दुल बासित, यदि तुम सोचते हो कि तुम इस तरह की हरकतों से जीत जाओगे तो यह तुम्हारी भूल है। इसलिए अच्छे बच्चे की तरह पाकिस्तानी जनरल्स से सॉरी कहो और उनसे आग्र्रह करो कि वे तुम्हारा पॉकेट मनी न काटें।
प्रस्तुति: सर्वदमन पाठक

Thursday, August 8, 2019



हम टुटपुंजिए चोरों की तरह व्यवहार क्यों करते हैैं?



बाली से एक वीडियो आया है जिसमें होटल स्टाफ द्वारा एक संपन्न भारतीय परिवार को चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़े जाते दिखाया गया है। यह उस समय का वीडियो है जब वह परिवार अपने कमरे से चोरी किये गए सामानों से भरे सूटकेस के साथ रवाना होने वाला था। जब होटल के कर्मचारियों ने हेयर ड्रायर्स, सोप डिस्पेंसर्स, टॉवल, हैैंगर, डेकोरेटिव आइटम सहित चोरी का सामान टेबिल तथा अन्य स्थानों से निकाला तो इस वायरल वीडियो में तमाम चश्मदीद खुद को शर्मिंदा तथा अपमानित महसूस करते दिख रहे थे। इन पर्यटकों को यह बात काफी चुभी कि चोरी के सामान के साथ पकड़े गए लोग उसके बाद भी सीनाजोरी कर रहे थे। पहले तो उन्होंने चोरी से इंकार करते हुए काफी उत्तेजना दिखाई लेकिन बाद में चोरी के सामान के 'भुगतानÓ के लिए तैयार हो गए। आखिर में तो पुराना तरीका अपनाते हुए गुस्से में भरे स्टाफ को ले देकर मामला सुलझाने की भी कोशिश की। यह सभी कुछ रिकार्डेड था और सारी दुनिया ने इसे देखा। यह भारत की हंसी उड़ाने वाला वाकया था। बाली में पकड़े गए उक्त भारतीय परिवार के अलावा भी कई ऐसे संपन्न भारतीय परिवार की ऐसी खबरें पहले भी मिली हैैं जो बर्न के पास 30 लाख रुपये प्रति रात्रि किराये वाले स्की रिसोर्ट में रुके थे। इस रिसोर्ट के प्रबंधन द्वारा लोगों को आगाह किया जाता रहा है कि वे अपने कमरे से कांप्लिमेंटरी ब्रेकफास्ट बफे के सामान भी नहीं ले जा सकते लेकिन लोग अपने मित्रों के व्हाट्सऐप ग्र्रुप में यह स्वीकार करते रहे हैैं कि उन्होंने ब्रेकफास्ट के लिए सजी टेबिल से बन्स तथा क्रोइसिएंट लाने का अपराध किया है। अब वे खुद से पूछ रहे हैैं कि इस वीडियो में दिख रहे चोरी करते पकड़े गए लोगों से वे क्या किसी भी तरह से बेहतर हैैं। चोरी कैसी होती है? क्या इनमें से कोई भी चोरी का औचित्य ठहरा सकता है या क्या उन्हें माफ किया जा सकता है? 
समाजशास्त्रियों से यह पूछना रोचक होगा कि हम टुटपुंजिये चोरों की तरह क्यों व्यवहार करते हैैं। हम अपने लपकते हुए हाथों को कुकी जार से बाहर क्यों नहीं रख सकते? क्या इसका भूख से वंचित रहने की किसी काफी पहले दफन हो चुकी याद से कुछ लेना देना है? प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अपनी कहानियां हैैं कि किस तरह उनके दादे-परदादे भूखे रह जाते थे ताकि उनके बच्चे खाना खा सकें। चूंकि खाना और प्रगति एक दूसरे से जुड़े हुए हैैं इसलिए हमारा भूखमरों की तरह खाना इस बात से संबंधित है कि हम कैसे बड़े होते हैैं-कितने अधिक या कितने कम संसाधनों के साथ? ऐसी स्मृतियों को पूरी तरह से दिलोदिमाग से हटा देना आसान नहीं होता। संपन्न लोगों में भी यह असुरक्षा की भावना रहती है कि खाना कहीं खतम न हो जाए इसलिए इसे जमा कर लो। हम सिर्फ खाने के सामान तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि आराम से कुछ भी या सब कुछ चुरा लेते हैैं। एक हेयर ड्रायर की कीमत आत्मसम्मान के आसपास भी नहीं होती। अपना सिर ऊंचा रखें। 
                                सर्वदमन पाठक

Tuesday, August 6, 2019

एक और ‘अगस्त क्रांति’

अपने दूरगामी फैसलों से देश को जब तब चमत्कृत कर देने वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने अब अपनी चमत्कारी शैली से राष्ट्र की आजादी की नई इबारत लिख दी है। सुखद संयोग यह है कि आजादी के बाद से ही अलगाववाद और आतंकवाद के नासूर से देश को मर्मांतक पीड़ा पहुंचाने वालेकश्मीर को , 370 तथा अनुच्छेद 35-ए के खात्मे की सर्जरी से निजात दिलाने का यह करिश्मा अगस्त माह में ही हुआ, जो अगस्त क्रांति(9 अगस्त 1942) तथा स्वतंत्रता दिवस(15 अगस्त 1947) के रूप में आजादी के महत्वपूर्ण पड़ाव का साक्षी रहा है। स्वाभाविक है कि इस फैसले के बाद कश्मीर अब अन्य हिस्सों की तरह ही देश का एक हिस्सा हो जाएगा और इसका विशेष दर्जा खत्म हो जाएगा जो भेदभाव की एक बड़ी वजह था। पूर्ण राज्य का दर्जा खत्म कर कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाने तथा लद्धाख को उससे पृथक केंद्र शासित प्रदेश में तब्दील करने की रणनीति कश्मीर राज्य के भीतर भाजपा की रची जाने वाली व्यूहरचना का ही संकेत है। इस फैसले के दूरगामी प्रभावों को देखते हुए यह अनुमान लगाना कोई रॉकेट साइंस जैसा मुश्किल नहीं है कि ऐतिहासिक भूलों से देश की पूर्ण आजादी के सामने सवालिया निशान बनकर खड़े कश्मीर का भूगोल और सियासत इस फैसले से पूरी तरह बदल जाएगी और आतंकवाद परोसने वालों के हाथों की कठपुतली बने स्थानीय नेता घाटी के भोले भाले लोगों को अपनी उंगलियों पर नचाने की ताकत खो बैठेंगे। आतंकवाद के निर्यातक पड़ौसी देश पाकिस्तान तथा स्थानीय आतंकवादियों के समर्थन से अपनी राजनीतिक दूकान चमकाने वाले नेताओं की बेचैनी तथा बौखलाहट इस बात का जीता जागता प्रमाण है। सारे देश में मनाया जा रहा जश्न यही दर्शाता है कि देश इस फैसले की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा था। वास्तविकता यह है कि देश की इस आकांक्षा को सरकार ने पूरी शिद्दत से महसूस किया और इसी जनाकांक्षा ने उसे इतने बड़े फैसले के लिए शक्ति और मनोबल प्रदान किया। सरकार की यह राजनीतिक इच्छाशक्ति उसे देश की सियासत में माइलेज प्रदान करे तो आश्चर्य ही क्या है। कुछ राजनीतिक दल अपने पूर्वाग्र्रहों के कारण इस कदम का  विरोध कर रहे हैैं, वह उनकी राजनीतिक अअदूरदर्शिता ही है। 
इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता कि भले सरकार ने साहस का परिचय देते हुए यह अहम फैसला किया है लेकिन इन कदमों के क्रियान्वयन का रास्ता उतना आसान नहीं होगा। कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की शतरंज में एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है और इस खेल में भारत कितनी चतुराई से अपनी चाल चलता है, उक्त फैसले की सफलता इस पर भी निर्भर करेगी। फिलहाल घाटी में भारत की भारी सैन्य उपस्थिति के कारण वहां पनप रहे असंतोष और गुस्से का कोई सटीक अंदाजा लगाना मुश्किल है लेकिन वहां की जनता की भावनाओं की जीतना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। 
      सर्वदमन पाठक

Sunday, October 1, 2017

केकवॉक में साजिशों की कुकिंग

शोभा डे का ब्लॉग


जब से गौरी लंकेश की हत्या हुई है, मैैं लिखने के लिए 'सुरक्षितÓ टॉपिक की तलाश में हूं। मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि मैैंने अंतत: ऐसा एक विषय तलाश लिया है-वह है 'केक बेकिंगÓ। लेकिन इसमें थोड़ी समस्या है। मैैंने जिंदगी में कभी केक बेक नहीं किया है। सिर्फ कुछ केक खाए अवश्य हैैं। लेकिन इससे उस विषय पर कॉलम लिखने में मुझे कुछ भी रुकावट नहीं आती, जिसके बारे में मैैं बहुत कम जानती हूं। ठीक वैसा ही गौरी के बारे में कहा जा सकता है। उसके जीवन और मौत के बारे में टिप्पणी करने वाले कितने लोग उसके बारे में पर्याप्त रूप से जानते हैैं? बहुत कम। कितने लोग उन परिस्थितियों से वाकिफ हैैं जिनके तहत गौरी की हत्या की गई? बहुत कम। उसके हत्यारे या हत्यारों की पहचान के बारे में कौन जानता है? अभी तक कोई नहीं। लेकिन हम सभी इस बारे में अपनी राय जाहिर कर रहे हैैं, निष्कर्ष निकाल रहे हैैं और अपने अपने अंदाज लगा रहे हैैं जिसका इससे कोई संबंध नहीं है।
केक के साथ भी ऐसा ही है। हम आकर्षक पेटिसरीज में जाते हैैं और वहां सजे हुए केक के बारे में सर्वे करते हैैं मानो हम सभी केक एक्सपर्ट हों। फिर हम एक केक चुन लेते हैैं जो हमारे बजट तथा रुचि के अनुरूप होता है। हम उसका एक टुकड़ा चखते हैैं और उसे नापसंद कर देते हैैं। हम अपना पैसा वापस चाहते हैैं लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। फिर हम उसमें कमियां निकालना शुरू कर देते हैैं। हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैैं कि हमें पेस्ट्री शॉप द्वारा ठगा गया है क्योंकि बेकर ने इसमें आटा एवं बटर सही अनुपात में इस्तेमाल नहीं किया। हम खुद ही तय कर लेते हैैं कि केक में घटिया स्तर की चॉकलेट इस्तेमाल की गई थी, ओवन डिफेक्टिव था, क्रीम कम थी, बेकर ने ज्यादा नमक का इस्तेमाल किया था या पैकेजिंग भ्रामक थी। हम उस केक शॉप का बहिष्कार करने की ठान लेते हैैं। हम अपने बुरे एक्सपीरियंस के बारे में अपने दोस्तों को बताते हैैं। वे दूसरों को बताते हैैं। आखिरकार जनता की राय के सामने झुकते हुए उक्त केक शॉप अपनी दुकान बंद हो जाता है।  
गुस्सा फैलता है। कुछ केक प्रेमी खुद ही केक बनाते का फैसला करते हैैं। वे अपना एक ग्र्रुप बना लेते हैैं। हर कोई तो इस ग्र्रुप में शामिल हो नहीं सकता। इस ग्र्रुप में शामिल होने को लेकर कुछ लोग जुनूनी हो सकते हैैं। उन्हें उचित तवज्जो न दिये जाने पर वे विरोध स्वरूप अपना प्रतिद्वंदी केक ग्र्रुप बना लेते हैैं। इससे टकराव हो जाता है और पड़ौस की शांति को खतरा उत्पन्न हो जाता है। पथराव की कुछ घटनाएं होती हैैं। कुछ भड़काऊ पर्चेबाजी भी होती है। अनियमितताओं के आरोप लगाए जाते हैैं और स्थिति नियंत्रण के बाहर हो जाती है। जो लोग केक पसंद नहीं करते, वे अपना अलग ग्र्रुप बनाकर विरोध प्रदर्शित करने लगते हैैं। वे 'शुद्ध देशी घी मिठाई क्लबÓ बना लेते हैैं। कुछ लोग केक को राष्ट्र विरोधी घोषित करते हुए पूछते हैैं कि ये केकवाले केक ही क्यों बनाते हैैं, जलेबी और रसगुल्ला क्यों नहीं बना सकते? इसके पीछे कोई विदेशी हाथ होना चाहिए। केक भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। इसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए। इस बीच प्रमुख केक बेकर्स पर सतर्क निगाह रखी जाती है। कोई मोर्चा निकालने का सुझाव देता है तो दूसरा सुझाता है कि केंडल मार्च निकाला जाए क्योंकि इसे ज्यादा टेलीविजन कवरेज मिलेगा। इनका नेता गरजता है कि हम इन केक बेकर्स के खिलाफ कुछ ज्यादा ही नरम रुख अपना रहे हैैं। वे हमारी सोसायटी के लिए खतरनाक हैैं। केक सारे देश में फैल जाए, इसके पहले हमें उनको रोकने के लिए रणनीति बनानी होगी। केक पश्चिमी प्रोपेगंडा का हिस्सा है। हमारे युवक और भ्रष्ट हों, इसके पहे केक क्रांति को खत्म करना जरूरी है।
केक प्रशंसकों के तेजी से हो रहे फैलाव को रोकने के लिए एक योजना तैयार की जाती है। केक प्रशंसकों की लिस्ट तैयार की जाती है और   उन्हें चेतावनी दी जाती है कि वे केक की तारीफ बंद करें या फिर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें। उनमें से एक व्यक्ति सलाह देता है कि चीफ बेकर को केक बनाने से रोका जाए लेकिन सवाल यह उठता है कि कैसे क्योंकि केक नुकसानदेह तो है नहीं। केक की तारीफ करने वालों को सबक सिखाने के लिए सीधी कार्रवाई के तौर पर पेड़ा और बर्फी के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करने का फैसला किया जाता है और कोई मोटर साइकिल पर सवार होकर इनके कई हेलमेटधारी समर्थक इसे अंजाम देने के लिए निकल पड़ते हैैं।
इधर मैैं दुविधा में हूं। सवाल यह है कि मैैं केक बनाऊं या न बनाऊं।
प्रस्तुति: सर्वदमन पाठक

Saturday, July 16, 2016

क्या स्वामी राजनीति के कमाल आर खान हैं?



स्वामी ने अपने द्वारा चुने गए गंदे काम सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। रघुराम राजन आखिर अपना सामान समेटकर अपने घर लौट रहे हैं।  दिलचस्प बात यह है कि स्वामी ने रघुराम राजन के बारे में कहा था कि वे पूरी तरह मानसिक रूप से भारतीय नहीं हैं। राजन ने यह सही सिद्ध कर दिया है। ईश्वर को इस बात के लिए धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि लाखों सही सोचने वाले लोगों की तरह रघु भी निश्चित ही 'मानसिक रूप से पूरी तरह भारतीय नहीं हैं। यदि वे स्वामी जैसे भारतीय होते तो वे जहां तहां झूलते रहते, लोगों को खारिज करते रहते और दिल्ली दरबार में दंडवत करते रहते। रघुराम सर्वश्रेष्ठ प्रकार के भारतीय हैं जो देश के हित में सोचते हैं और वैश्विक तरीके से कार्य करते हैं।

लगता है कि सुब्रमण्यम स्वामी अपने आपको भारत के डोनाल्ट ट्रम्प तथा राजनीति के कमाल आर खान के रूप में मशहूर करने के लिए काफी जल्दबाजी में हैं। संभव है कि उनके पास डोनाल्ट ट्रम्प से कहीं ज्यादा धन हो। लेकिन ट्रम्प के सिर पर उनकी अपेक्षा कहीं ज्यादा बाल हैं। अलबत्ता दोनों में एक चीज कॉमन है कि उनके सिर बड़े हैं। कमाल आर खान बॉलीवुड के चर्चित व्यक्ति हैं। कोई भी व्यक्ति निश्चित रूप से यह नहीं जानता कि कमाल खान आखिर करते क्या हैं? लेकिन वे लगातार दूसरों पर जुबानी हमले करते रहते हैं। स्वामी और खान उन लोगों के खिलाफ ट्वीट करके ही फलते फूलते हैं। जिन्हे वे पसंद नहीं करते। इनमें कोई भी व्यक्ति शामिल  हो सकता है। हैडलाइन बटोरने की वजह से हुए अपमान के कारण वे संसद में 'आइटम नंबर बन चुके हैं जबकि इनमें से दूसरा व्यक्ति विक्रम भट्ट को इस हद तक नाराज करने में सफल रहा है कि विक्रम को उसके खिलाफ मुकदमा करना पड़ा। भट्ट ने तो गरजते हुए कहा था 'गंदगी से लडऩे के लिए में भी गंदगी बन जाऊंगा यह सिद्ध करने के लिए कि वे वास्तव में इस मामले में गंभीर हैं, खान के सभी गंदे ट्वीट उन्हें दोहराये हैं।  इस प्रक्रिया में उन्होंने खान द्वारा निशान बनाई गई बॉलीवुड की सुंदर अभिनेत्रियों का अपमान दुगना कर दिया है। क्या इसका कोई मतलब है।  मैलापुर के सुब्रमण्यम स्वामी (वे वहां जन्मे हैं) को अंतत: भारत के हैडमास्टर नरेंद्र मोदी ने अपने पसंदीदा व्यक्ति के रूप में चुन लिया है। हालांकि इसमें काफी देर हो गई।
स्वामी ने अपने द्वारा चुने गए गंदे काम सफलता पूर्वक पूरे किए हैं। रघुराम राजन आखिर अपना सामान समेटकर अपने घर लौट रहे हैं।  दिलचस्प बात यह है कि स्वामी ने रघुराम राजन के बारे में कहा था कि वे पूरी तरह मानसिक रूप से भारतीय नहीं हैं। राजन ने यह सही सिद्ध कर दिया है। ईश्वर को इस बात के लिए धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि लाखों सही सोचने वाले लोगों की तरह रघु भी निश्चित ही 'मानसिक रूप से पूरी तरह भारतीय नहीं हैं। यदि वे स्वामी जैसे भारतीय होते तो वे जहां तहां झूलते रहते, लोगों को खारिज करते रहते और दिल्ली दरबार में दंडवत करते रहते। दुर्भाग्य से यही 'टिपीकलÓ भारतीय मानसिकता है। रघुराम सर्वश्रेष्ठ  प्रकार के भारतीय हैं जो देश के हित में सोचते हैं और वैश्विक तरीके से कार्य करते हैं। शायद उनकी यही प्रमुख 'कमी है। रघुराम राजन के खिलाफ अपने लक्ष्य को पा लेने के बाद स्वामी ने अन्य 'खतरोंÓ पर अपनी बंदूक तान दी है।
यह अप्रत्याशित ही था कि उनकी गंदगी फैलाने की क्षमता काफी उजागर हो गई और उन्हें अचानक पदावनत कर दिया। प्रधानमंत्री की तीखी सार्वजनिक झिड़की ने उन्हें फिलहाल  उनकी वर्तमान हैसियत में पहुंचा दिया है। लेकिन उनके द्वारा की गई क्षति तो हो चुकी है। राजन जहां से आए थे, वहां जाने वाले हैं। अरुण जेटली इस पर आश्चर्य चकित हैं। राजन का स्थान कौन लेगा इस चर्चा के बीच यह सही समय है कि आरबीआई का गर्वनर किसी महिला को बनाया जाए। महिलाएं बहुत ही समझदारी से तथा शानदार तरीके से धन तथा धन से संबंधित मामलों को देखती हैं। एक महिला जरूरी आर्थिक सुधारों को अधिक सख्ती से लागू कर सकती है। 
परिणामों की परवाह किए बिना वह पूरी क्षमता तथा निष्ठा के साथ कार्य करेगी और राजन ने जो काम शुरू किया था उसको अंजाम तक पहुंचाएगी। इस तरह की निर्भीक तथा ताजगीभरी सोच ही भारत को मुश्किलों से बाहर निकालेगी। प्रिय सुब्रमण्यम स्वामी कृपया अपने व्याकरण की अशुद्धियों से भरे ट्वीट्स से अरुणधंति भट्टाचार्य की जिंदगी को दूभर न बनाएं।

- प्रस्तुति -
सर्वदमन पाठक
समाचार संपादक
दैनिक जागरण भोपाल

Thursday, April 25, 2013

 मप्र भी शर्मसार है चाइल्ड रेप के कलंक से
प्रसंगवश
सर्वदमन पाठक
पांच साल की मासूम बच्ची से बलात्कार की पैशाचिक घटना पर एक बार फिर दिल्ली दहल उठी है। इस घिनौनी हरकत पर लोगों में गुस्से का ज्वार फूट पड़ा है और लोग सड़कों पर उतर आए हैैं। इस मामले में पुलिस के संवेदनहीन रवैये को लेकर लोगों में खासी नाराजी है और इसी वजह से पुलिस आयुक्त को हटाए जाने की मांग करते हुए प्रदर्शन का सिलसिला भी चल पड़ा है। दिल्ली में बलात्कार की इतनी ज्यादा घटनाएं पिछले दिनों हुई हैैं कि अगर इसे रेप केपिटल कहा जाए तो कतई अतिशयोक्ति नहीं होगी। शहरों में दिल्ली रेप के मामले में जितनी कुख्यात है, राज्यों में मध्यप्रदेश की वही स्थिति है। दिल्ली में पैशाचिक दुष्कर्म की शिकार नन्हीं बच्ची का इलाज कर रहे एम्स के डाक्टरों की यह रिपोर्ट थोड़ी राहत भरी है कि उसकी हालत लगातार सुधर रही है और एक सप्ताह में वह लोगों से बात करने की स्थिति में हो जाएगी लेकिन मध्यप्रदेश में सिवनी जिले के घंसौर में दुष्कर्म की शिकार बच्ची , जिसे बेहतर इलाज के लिए जबलपुर से नागपुर ले जाया गया था, अभी भी वेंटिलेटर पर है और चिंताजनक बात यह है कि उसके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया है जो उसकी अत्यंत ही नाजुक स्थिति का संकेत देता है। इसी तरह छिंदवाड़ा के तामिया नामक स्थान पर दुष्कर्म की शिकार हुई चार वर्ष की बच्ची की हालत भी नाजुक बनी हुई है। दिल्ली रेप कांड के दोनों आरोपियों को पकड़ लिया गया है लेकिन मध्यप्रदेश में दोनों मामले पुलिस की नाकामी की कहानी कहते हैैं। घंसौर कांड का आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर है। तामिया पुलिस की अमानवीयता का यह आलम है कि तीन घंटे तक खून से लथपथ बच्ची को लिए उसकी मां पुलिस के सामने गिड़गिड़ाती रही लेकिन पुलिस उसकी रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करती रही। इस घटना का आरोपी बाद में गिरफ्तार कर लिया गया है लेकिन खरगौन जिले के झिरनिया गांव में छह साल की बच्ची से दुष्कर्म कर उसको मौत के घाट उतार देने वाला चाचा अभी भी पकड़ा नहीं जा सका है। दरअसल महिलाओं के यौन उत्पीडऩ के मामले में मध्यप्रदेश के माथे पर कलंक के टीके की तरह चिपका हुआ एक नंबर छूटने का नाम ही नहीं ले रहा है। एशियन सेंंटर फार ह्यïूमन राइट्स की ताजा रिपोर्ट तो मध्यप्रदेश के लिए शर्म की पराकाष्ठा ही हैै जिसके द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 तक चाइल्ड रेप के सबसे ज्यादा 9465 मामले मध्यप्रदेश में दर्ज किये गए हैैं।
गौरतलब है कि दिल्ली के दिसंबर में हुए सामूहिक रेप कांड के बाद देश भर में जो विरोध और गुस्से की अभूतपूर्व लहर उठी थी, उसके बाद केंद्र की ही तर्ज पर  मध्यप्रदेश ने भी इनकी रोकथाम के लिए महिला हेल्पलाइन सहित कई कदमों की घोषणा की थी लेकिन अमल के स्तर पर अभी भी हालत बहुत ही निराशाजनक है। राज्य सरकार को इस बात पर मंथन करना चाहिए कि उसने महिलाओं के आर्थिक तथा सामाजिक उत्थान के लिए कई कदम उठाये हैैं जिनकी सारे देश में सराहना हो रही है लेकिन आखिर क्या कारण है कि महिलाओं और बच्चियों के यौन उत्पीडऩ की घटनाओं पर अंकुश लगाने में सरकार लगातार नाकामयाब हो रही है। सरकार की यह दलील कुछ हद तक सही हो सकती है कि आम तौर पर बच्चियों के यौन शोषण तथा बलात्कार में उनके करीबी रिश्तेदारों या परिचितों का हाथ होता है इसलिए इन्हें रोकना काफी मुश्किल होता है लेकिन पुलिस तथा प्रशासन द्वारा इस तरह की घटनाओं के प्रति बरती जाने वाली आपराधिक उदासीनता भी ऐसी घटनाओं को जाने अनजाने में बढ़ावा ही देती है। मध्यप्रदेश में यौन उत्पीडऩ के डरावने आंकड़े इसी हकीकत को दर्शाते हैैं। इस समय चाइल्ड रेप के खिलाफ सारे देश में गुस्से का सैलाब आ गया है। मौके की नजाकत को भांपते हुए शिवराज सरकार को पुलिस तथा प्रशासन को ऐसे मामलों में तत्परतापूर्वक कार्रवाई करने के सख्त निर्देश देने चाहिए और इस मामले में ढिलाई बरतने वालों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके अलावा सरकार को खुद ऐसे घृणित अपराधों के खिलाफ वातावरण बनाने के लिए एक गहन तथा व्यापक अभियान चलाना चाहिए तथा सामाजिक तथा सांस्कृतिक संगठनों को भी इसके खिलाफ गतिशील करना चाहिए ताकिहमारी नारी पूज्या संस्कृति को कलंकित करने वाले असभ्यता के इन अंधेरों पर विजय पाई जा सके।  

जंग लगे हथियारों से चुनावी जंग कैसे लड़ेगी कांग्र्रेस ?
सर्वदमन पाठक
 मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव में जहां एक ओर भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता सिंहासन हासिल करने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा रही हैै, वहीं दूसरी ओर सत्ता की मृगतृष्णा में दस साल से भटक रही  कांग्र्रेस येन केन प्रकारेण राज्य विधानसभा की चुनावी जंग के लिए अपने जंग लगे हथियारों पर एक बार फिर धार चढ़ाने में जुट गई है। पिछले कुछ समय से जनसंघर्ष के नाम पर किये जा रहे छुटपुट तथा निहायत ही प्रभावहीन आंदोलनों के बाद अब कांग्र्रेस चुनावी व्यूहरचना के लिए अपने युवराज राहुल गांधी की ओर आशाभरी नजरों से देख रही है। इसी उम्मीद की बेल को परवान चढ़ाने की शुरुआती कड़ी में बुधवार को राहुल गांधी के सानिध्य में चिंतन बैठकों का आयोजन हुआ जिसमें पार्टी के सांसदों, विधायकों तथा पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया। चौदह जिलों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में इस बैठक में पार्टी की खूबियों और कमजोरियों पर चर्चा हुई। कार्यकर्ताओं से राहुल गांधी का सीधा संवाद इस बैठक का आकर्षण था। बैठक में पार्टी को मजबूत करने तथा चुनावी तैयारियों के लिए कमर कसने के तौर तरीकों पर चिंतन होना था लेकिन जैसा कि अनुमान था, यह बैठक चिंतन बैठक के बदले चिंता बैठक में तब्दील हो गई। एक दशक से सत्ता का वनवास झेलते झेलते जिस पार्टी का संगठन इस कदर लुंज पुंज हो चुका हो कि चुनावी तैयारियों के लिए उसे कार्यकर्ताओं को टोटा पड़ा हो, उस पार्टी का चिंतित होना स्वाभाविक ही है।
इस बैठक का यह संकेत बिल्कुल स्पष्ट था कि राहुल गांधी पार्टी को मैदानी स्तर पर खड़ा करना चाहते हैैं ताकि वह चुनावी चुनौतियों का सामना करने में समर्थ हो लेकिन बैठक के माहौल से उन्हें यह भली भांति समझ में आ गया होगा कि इस उद्देश्य के रास्ते में कांग्र्रेस के सामने रोड़े ही रोड़े हैैं। इसमें सबसे पहला रोड़ा पार्टी का बदला हुआ चरित्र ही है। दरअसल कांग्र्रेस सूरजमुखी के फूल की मानिंद हो गई है जो सत्ता सूर्य को देखकर ही खिलता है। जाहिर है कि दस साल से सत्ता से दूर कांग्र्रेस पार्टी आजकल निष्ठावान कार्यकर्ताओं की कमी से जूझ रही है। यदि पार्टी योग्य तथा विजयी संभावनाओं वाले प्रत्याशियों का चयन कर उन्हे चुनावी जंग में उतार भी दे तो निष्ठावान कार्यकर्ताओं के अभाव में उनकी जीत की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। पार्टी का दूसरा बड़ा रोड़ा अंदरूनी गुटबाजी की आत्मघाती प्रवृत्ति है। अलग अलग छत्रपों की निष्ठाओं में बंटे प्रदेश कांग्र्रेस के कार्यकर्ता आंतरिक संघर्ष से इस कदर ग्र्रस्त हैं कि विपक्षी पार्टी को हराने के बजाय वे अपनी ही पार्टी के अन्य गुटों के नेताओं को हराने में अपनी शान समझते हैैं।
राहुल गांधी का खुद का नेतृत्व कितना चमत्कारी है, यह कहना काफी मुश्किल है। उत्तरप्रदेश, बिहार तथा गुजरात के चुनावों में कांग्र्रेस की घोर असफलता वहां के कांग्र्रेस संगठनों के मृतप्राय संगठनात्मक ढांचे का ही परिणाम थी इसलिए इन दोनों राज्यों की पराजय का ठीकरा राहुल के सिर फोडऩा उनके साथ अन्याय ही होगा। मध्यप्रदेश में भी कांग्र्रेस संगठन कमोवेश इसी गति को प्राप्त हो गया है इसलिए यहां भी विधानसभा चुनाव में उसकी जीत के लिए पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में उत्साह का संचार करने, कार्यकर्ताओं में जीत की अलख जगाने तथा कांग्र्रेस नेतृत्व के चमत्कार की जरूरत होगी। यक्ष प्रश्न यही है कि क्या राहुल गांधी प्रदेश कांग्र्रेस के निराश हताश कांग्र्रेस कार्यकर्ताओं में इस हद तक जान फूंक पाएंगे कि राज्य में कांग्र्रेस की दहलीज पर पहुंच सके। चिंतन बैठक के रूप में उनकी शुरुआती कोशिश पार्टी की उम्मीदों को कितना आगे ले जाती है, यह तो वक्त ही बताएगा।