Wednesday, February 13, 2013

हाल-ए-भोपाल

 अपराधियों की गिरफ्त में राजधानी
सर्वदमन पाठक

आजकल भोपाल पर अपराधियों की विशेष  'मेहरबानीÓ है। जहां देखो वहां इसके प्रमाण  देखे जा सकते हैैं। इन अपराधियों की वजह से हर तरह नागरिकों का जीना हराम है। कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब शहर में अपराध की कोई सनसनीखेज वारदात न होती है। पिछले चौबीस घंटे भी इस मायने में कोई अपवाद नहीं रहे हैैं। राजधानी में आम नागरिक  लगभग हर दिन ही लुटता है जो पुलिस की नजर में महत्वहीन घटना होती है। इसी कड़ी में शहर में पिछले चौबीस घंटों में तीन लूट की वारदातें हुई हैैं लेकिन सबसे सनसनीखेज वारदात राजभवन से बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर घटी। राजभवन के ठीक सामने स्थित टाइटन शो रूम में पचास लाख की घडिय़ों की चोरी हो गई और पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। चोरों ने पूरे इत्मीनान से इस वारदात को अंजाम दिया, मानो उसे पुलिस का कोई भय न हो। उन्होंने बाकायदा सब्बल से शटर से लगा कांच तोड़ा और उसके बाद शटर का ताला तोड़ा। ये दोनों कारगुजारियां बिना आवाज हो ही नहीं सकतीं। इतना ही नहीं, चोरों ने आराम से छांट छंाटकर सोने की घडिय़ां निकाल लीं। इस पूरे काम में उन्हें काफी समय लगा होगा लेकिन पुलिस कितनी चाक चौबंद थी इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसे इस पूरे घटनाक्रम का पता तब लगा जब इस शो रूम का मालिक चोरी की रिपोर्ट करने थाने पहुंचा। राजभवन के नजदीक होने के कारण इस स्थान को अतिसुरक्षित क्षेत्रों में माना जाता है। यहां पुलिस से अतिरिक्त रूप से सचेत रहने की अपेक्षा होती है। यह स्थान पुराने भोपाल और नए भोपाल का संगम स्थल है इसलिए यहां दोनों क्षेत्र का पुलिस बल गश्ती पर तैनात रहता है। राजभवन में भी सुरक्षा बल काफी संख्या में होता है लेकिन इस घटना के समय गश्ती पुलिस का कहीं अता पता नहीं था। इससे सिर्फ यही अनुमान लगाया जा सकता है कि गश्ती दल अपने काम की औपचारिकता पूरी करने में भी विश्वास नहीं रखते। हालांकि पुलिस यह दावा लगातार करती रहती है कि रात्रि में गश्ती के दौरान पूरी सावधानी तथा सतर्कता बरती जाती है। जब राजधानी में जहां पुलिस के तमाम आला अधिकारी मौजूद रहते हैैं, कानून व्यवस्था की हालत इतनी खस्ता है तो दूर दराज के इलाके में क्या हाल होता होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। लेकिन इसकी एक हकीकत और है जिसे पुलिस कभी स्वीकार नहीं करती। दरअसल पुलिस और अपराधियों में रिश्ते काफी मधुर होते हैैं। ये संबंध आम तौर पर पैसे पर टिके होते हैैं। यही वजह है कि ये संबंध इतने मजबूत होते हैैं कि आला अफसर लाख सिर पटक लें, उन्हें तोडऩा तो दूर, जरा सा शिथिल भी नहीं कर पाते। आप यदि किसी अपराधी का नाम तथा हुलिया भी पुलिस को बता दें तो भी पुलिस उसकी गिरफ्तारी से बचने की हरसंभव कोशिश करती है। अलबत्ता सत्ता से जुड़े या बड़े राजनीतिक रसूख वाले व्यक्ति के यहां वारदात हो और सरकार का पुलिस पर अत्यधिक दबाव हो तो रातों रात क्षेत्र के तमाम अपराधियों को  थाने में तलब कर अपराध कबूल करवाया जा सकता है और चोरी का माल बरामद कराया जा सकता है। इसका सीधा सादा आशय यही है कि चोरी, डकैती जैसे तमाम अपराधों में आम तौर पर पुलिस खलनायक के बदले सहायक की भूमिका में होती है। लेकिन अब पुलिस की सोची समझी अकर्मण्यता के कारण जनता अपराधों से त्राहि त्राहि करने लगी है। वास्तविकता यही है सरकार की तीसरी पारी के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा कानून व्यवस्था की दुव्र्यवस्था ही है जिससे आम आदमी की शांति और सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। सवाल यही है कि चुनाव के करीब खिसकने के बावजूद सरकार लोगों के भरोसे को दांव पर लगाना पसंद करेगी या फिर प्रशासनिक सख्ती बरतकर लोगों की सुख शांति बहाल करेगी।

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