Wednesday, June 10, 2009

टूटे कई मुंगेरी लालों के हसीन सपने


मतदाताओं की चतुराई पर शंका जताने वाले राजनीतिक विश्लेषकों के लिए लोकसभा चुनाव के नतीजे करारा तमाचा हैं। जन अदालत ने अपने फैसले से कांग्रेस नीत यूपीए सरकार को बहुमत की दहलीज पर पहुंचाकर एक बार फिर सत्ता के कलश कंगूरे पर इठलाने का अवसर प्रदान कर दिया है, वहीं दूसरी ओर एनडीए की किस्मत में पराभव की ऐसी नियति लिख दी है जिससे वह अठारह वर्ष पहले जूझ रही थी। इतना ही नहीं, लालू तथा पासवान जैैसे बड़बोले नेताओं की हैसियत को जनता ने राजनीति के ड्राइंगरूम में सजे गुलदस्ते से उठाकर इतिहास के कूड़ेदान में फेेंक दिया है। विश्व राजनीति की वर्तमान सच्चाई की ओर पीठ करके चलने वाले वामपंथी दलों को परमाणु करार पर यूपीए सरकार से समर्थन वापिसी का इतना भारी खमियाजा उठाना पड़ेगा, इसकी उन्हें शायद ही कोई कल्पना रही होगी। केरल में उन्हें कांग्रेस के हाथों तगड़ी शिकस्त तो झेलनी ही पड़ी है लेकिन उन्हें अपने ही गढ़ पश्चिमी बंगाल में कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस गठबंधन के हाथों पराजित होने की जिस अनहोनी का सामना करना पड़ा है उससे आने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता खोने का खतरा उनके सिर पर मंडराने लगा है। उधर उड़ीसा में ऐन चुनाव से पहले भाजपा से किनाराकशी करने वाला नवीन पटनायक के नेतृत्व वाला बीजद विधानसभा चुनाव में जबर्दस्त कामयाबी हासिल कर पुन: सत्ता पर काबिज होने जा रहा है जबकि आंध्र में कांग्रेस के एक बार फिर सत्तासीन होने का रास्ता साफ होता दिख रहा है। कांग्रेस नीत यूपीए की इस चुनावी आंधी में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का घरोंदा इतनी बुरी तरह तबाह हो गया है कि खुद प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी ने इस पराजय से घबराकर राजनीति से ही तौबा करने की पेशकश कर दी है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में कांग्रेस 21 सीटों पर जीत दर्ज कराकर सपा एवं बसपा के समकक्ष आकर खड़ी हो गई है और इस तरह उसने यह सिद्ध कर दिया है कि आने वाले समय में वह भी राज्य की सत्ता की प्रमुख दावेदार बन सकती है वहीं दूसरे सबसे बड़े राज्य बिहार में लालू पासबान का किला ढह जाने से कांग्रेस के प्रमुख प्रतिस्पर्धी दल के रूप में उभरने की संभावनाएं बलवती हो गई हैं। देश के दिल दिल्ली तथा देश की औद्योगिक राजधानी मुंबई में कांग्रेस नीत गठबंधन ने अपने प्रतिद्वंदी दलों का पूरी तरफ सफाया कर दिया है और रणबांकुरों का प्रदेश राजस्थान कांग्रेस के शौर्यपूर्ण प्रदर्शन के कारण भाजपा के सपनों का लाक्षागृह बनकर रह गया है। गुजरात एवं छत्तीसगढ़ में अवश्य ही भाजपा ने अपनी उम्मीद के अनुरूप प्रदर्शन किया हालांकि मध्यप्रदेश में उसका प्रदर्शन विधानसभा चुनाव की तुलना में काफी फीका रहा। जनता का यह फैसला भले ही अपने पूर्वाग्रह के चश्मे से देखने वाले दलों केे लिए समझ से परे हो लेकिन इसके निहितार्थ बिल्कुल ही स्पष्टï हैं। यह जनादेश विपक्ष के नकारात्मक चुनाव प्रचार के खिलाफ है जो सिर्फ सरकार की आलोचना पर ही केंद्रित था और जिसमें जनता के कल्याण के लिए किसी भी कार्यक्रम एवं नीतियों की कोई जगह नहीं थी। प्रधानमंत्री पर किये गये व्यक्तिगत हमले भी लोगों की नाराजी का एक बड़ा कारण बने और जनता ने इसे राष्टï्रीय गरिमा के खिलाफ मानते हुए राजग गठबंधन को अपनी वोट की ताकत से सबक सिखा दिया। मुद्रास्फीति में लगातार गिरावट के कारण महंगाई के मुद्दे पर विपक्षी हमलों की हवा निकल गई तो वहीं कंधार कांड के लिए बदनाम राजग के लिए आतंकवाद का मुद्दा बैक फायर कर गया। राजग के लिए एक मात्र तसल्ली की बात यह रही कि नीतीश सरकार द्वारा विकास तथा सामाजिक समरसता के लिए उठाए गए कदमों ने बिहार में राजग को एकतरफा जीत दिला दी।जनता ने यूपीए एवं विशेषत: कांग्रेस को ऐतिहासिक रूप से चमकदार सफलता दिलाकर मनमोहन सिंह के पुन: प्रधानमंत्री बनने के राह के तमाम कांटे हटा दिये हैं वहीं प्रधानमंत्री पद पाने के कुछ मुंगेरी लालों के हसीन सपनों को चकनाचूर कर उन्हेें यह संदेश दे दिया है कि अपनी महत्वाकांक्षाओं के आसमान में उडऩे के बदले राष्टï्र हित में वे नई सरकार के साथ सहयोग करें वरना उन्हें भी लोगों के प्रकोप का उसी तरह सामना करना पड़ सकता है जैसा कि इस चुनाव में विपक्ष को करना पड़ा है। -सर्वदमन पाठक

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