Monday, June 15, 2009

दरकती धरती, सिकुड़ता आसमान

दूसरी पार्टियों से भिन्न पहचान रखने का दावा करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस करने वाली भाजपा इन दिनों पार्टी के अंदर ही भिन्न भिन्न नेताओं के बीच चल रहे घमासान के लिए ही ज्यादा चर्चित है। लोकसभा चुनाव में भाजपा की जबर्दस्त पराजय के कारण पार्टी के भीतर लोगों में इतनी निराशा और गुस्सा है कि दलीय अनुशासन के तटबंध तक ध्वस्त हो रहे हैं। भाजपा के इस महाभारत में ठीक उसी तरह से मर्यादाएं टूट रही हैं जैसी कि कभी द्वापर के महाभारत में टूटी थीं। इतना ही नहीं, हार के कारणों की चर्चा के बहाने भाजपा में काफी समय से पनप रही प्रतिस्पर्धा भी विस्फोट की शक्ल ले रही है। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें दल के वे नेता ज्यादा मुखर हैं जो या तो खुद चुनावी रणनीतिकारों में शामिल थे या फिर जिनकी सोची समझी निष्क्रियता के कारण पार्टी को पराजय का इतना कड़वा स्वाद चखना पड़ा। मसलन सुधीन्द्र कुलकर्णी प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आड़वाणी के राजनीतिक सलाहकार होने के कारण खुद चुनाव की व्यूहरचना में शामिल थे लेकिन अब वे पार्टी पर वैचारिक हमले में सबसे आगे हैं। उनके इस हमले से भाजपा के बड़े वर्ग का उत्तेजित होना स्वाभाविक है क्योंकि इस हमले का निशाना पार्टी का वैचारिक आधार ही है। कुलकर्णी ने तो सीधे तौर पर भाजपा एवं आरएसएस के संबंधों को इस पराजय के लिए जिम्मेदार ठहराया है और पार्टी को मजबूत करने के लिए इन संबंधों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत रेखांकित की है। उन्होंने पार्टी में अंदरूनी टकराव को भी पराजय के लिए उत्तरदायी ठहराया है। पार्टी के कद्दावर नेताओं ने भी इस महाभारत में अपना अपना मोर्चा संभाल लिया है और आरोपों के विष बुझे तीर चलाने शुरू कर दिये हैं। मसलन पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने इस हार के लिए जिम्मेदार दलीय नेताओं पर कार्रवाई किये जाने के बदले उन्हें उपकृत किये जाने का आरोप लगाया तो उनका निशाना हाल ही में राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए गए अरुण जेटली थे। हालांकि खुद जसवंत सिंह ने जिस तरह से पार्टी के चुनाव अभियान में सार्थक हिस्सेदारी न करके अपना नकारात्मक योगदान दिया, यह कोई छिपी हुई बात नहीं है। इस संबंध में ताजा बयान पार्टी के एक और वरिष्ठï नेता यशवंत सिन्हा का है जिनकी राय है कि पराजय की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पार्टी के तमाम पदाधिकारियों को सामूहिक रूप से इस्तीफा दे देना चाहिए और फिर ये पद चुनाव से भरे जाने चाहिए। उन्होंने खुद पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। उनकी भी पीड़ा यही है कि पार्टी की पराजय के लिए जिम्मेदार नेता आज भी विभिन्न पदों से चिपके हुए हैं। अरुण जेटली के एक लेख ने भी पार्टी के लिए कुछ असुविधाजनक स्थिति बनाई है हालांकि वे भी पार्टी की चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। आरएसएस के वरिष्ठï नेता एमजी वैद्य को संघ और भाजपा के दूरी बनाने की बात इतनी नागवार गुजरी है कि उन्होंने कहा कि भाजपा चाहे तो यह दूरी बना सकती है लेकिन तब संघ का भाजपा से कोई संबंध नहीं होगा। हालांकि भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने स्पष्टï कर दिया है कि भाजपा संघ से कभी भी दूरी नहीं रखेगी। कारण चाहे जो भी हों, लेकिन यह तो तय ही है कि इस करारी पराजय ने पार्टी के मनोबल पर काफी गहरा असर डाला है और यदि इसके कारणों पर गंभीर मंथन कर इनके निदान की कोशिश नहीं की गई तो आने वाले समय में भाजपा का संकट और गहरा सकता है।इन सभी निष्कर्षों में ये बातें समान ही हैं- पार्टी के घटते जनाधार पर चिंता का इजहार और पार्टी के अंदरूनी टकराव एवं मतभेदों का चुनाव पर नकारात्मक असर। सवाल यही है कि भाजपा के लिए चुनाव के परिणामों का वास्तविक निहितार्थ क्या है और पार्टी उससे क्या सबक लेती है। सच तो यह है कि पार्टी का जनाधार और उसके नेतृत्व का ताना बाना पिछले पांच सालों में क्षतिग्रस्त हुआ है। पार्टी को चार राज्यों- आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल तथा केरल की कुल 143 सीटों में से एक ही सीट मिली है। वैसे इन राज्यों में पार्टी का जनाधार पहले भी कम था लेेकिन इन राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा नीत राजग गठबंधन का हिस्सा हुआ करती थीं और इस वजह से उनसे चुनावी गठबंधन द्वारा भाजपा और राजग का प्रदर्शन इतना निराशाजनक नहीं होता था। विशेषत: आंध्र तथा तमिलनाडु में तो अच्छी खासी सफलता भाजपा नीत गठबंधन के खाते में दर्ज होती थी। अब इन क्षेत्रीय दलों का भाजपा से मोहभंग हो चुका है और इसी वजह से न तो अपने बलबूते पर और न ही अपने सहयोगियों के भरोसे इन राज्यों में भाजपा की कोई उपस्थिति बची है। इस मोहभंग का सबसे बड़ा कारण यह है कि इन दलों को भाजपा के साथ जुडऩे से अपना मुस्लिम वोट बैंक छिटकने का खतरा नजर आने लगा था। उत्तर पूर्व में भी भाजपा का लगभग सूपड़ा साफ हो गया है। भाजपा के लिए यही चिंता की बात होनी चाहिए कि आखिर पिछले पांच वर्षों में ऐसा क्या हो गया कि इन दलों को भाजपा से यह खतरा क्यों महसूस होनेे लगा। क्या इन पांच सालों में भाजपा में आरएसएस का दखल इस हद तक बढ़ गया है कि बहुल संस्कृति वाले इस देश में अखिल भारतीय दल के रूप में विस्तार की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर पडऩे लगा है। यह कौन नहीं जानता कि भाजपा आरएसएस की ही राजनीतिक शाखा है लेकिन राजनीतिक दल के रूप में भाजपा की भी कुछ मजबूरियां हैं। यदि देश की पहचान सर्वसमावेशी संस्कृति ही भाजपा के सामाजिक आधार का मुख्य हिस्सा नहीं बनी तो भाजपा समूचे राष्टï्र में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने में कैसे सफल हो सकती है। पूर्व में भाजपा तथा आरएसएस में सप्रयास इतनी तार्किक दूरी बनाकर रखी जाती थी कि संघ और भाजपा एक ही नजर न आएं और भाजपा के एजेंडे पर संघ हावी न हो लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह दूरी मिटती जा रही है और वर्तमान चुनाव परिणाम इस तथ्य की ओर इंगित करते हैं। पार्टी में पुराने एवं बुजुर्ग नेताओं की इस कदर भरमार हो गई है कि पार्टी का चेहरा थका हुआ नजर आने लगा है और 60 फीसदी युवा मतदाताओं वाले देश में यह भी पार्टी के लिए चुनाव की दृष्टिï से नकारात्मक असर वाला मुद्दा रहा है।पार्टी में उच्च स्तर पर कुछ नेताओं के जमे रहने से पार्टी के अन्य कई वरिष्ठï नेताओं में एक तरह की कुंठा उपज रही है और पार्टी के अंदर अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिल रहा है। इस चुनाव में भी पार्टी की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित करने में इस अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा का भी हाथ रहा है। लेकिन सबसे चिंतनीय पहलू यही है कि अभी भी पार्टी आत्मचिंतन के लिए तैयार नहीं है। पार्टी हाईकमान अनुशासन के नाम पर इस ंिचंता के स्वर को दबाने और चुनावी परिणामों की समीक्षा के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेना चाहती है। संघ और भाजपा दोनों के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। यक्ष प्रश्र यही है कि क्या संघ अपने ब्रेन चाइल्ड को विकास के लिए समुचित देने को तैयार है और क्या भाजपा राजनीतिक दल के रूप में अपने विस्तार के आकाश को सीमित होते देखती रहेगी और इस मजबूरी की जंजीरों को तोडऩे के बदले ऐसी ही पराजय की विडंबनाओं को झेलती रहेगी। इन यक्ष प्रश्रों के उत्तर पर ही भाजपा का भविष्य निर्भर करेगा।
् -सर्वदमन पाठक

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