Tuesday, December 15, 2009

अथ पुलिस पिटाई कथा

भोपाल में पुलिस के मनोबल की क्या स्थिति है, यह एक घटना से बखूबी समझा जा सकता है। इस घटना का लब्बोलुवाब यही है कि छेड़छाड़ और मारपीट के एक आरोपी को ले जा रही पुलिस की जीप पर कुछ बदमाशों ने हमला कर दिया। इन बदमाशों ने जीप में तोडफ़ोड़ कर दी और पुलिसकर्मियों की पिटाई कर आरोपी को छुड़ा ले गए। हमारे रणबांकुरे पुलिस जवान इन बदमाशों से निरीह से पिटते रहे। यह अलग बात है कि बाद में उक्त आरोपी को पुलिस में गिरफ्त में ले लिया। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि जो पुलिस बदमाशों के हाथों पिट जाएगी, वह इन बदमाशों से लोगों की रक्षा कैसे कर पाएगी। वैसे यह कोई पहला वाकया नहीं है जब बदमाश पुलिस पर भारी पड़े हैं। निकट अतीत में प्रदेश में कई स्थानों पर ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं जिसमें पुलिस की बेचारगी झलकती है। थानों का घेराव आम बात हो ही गई है, कई स्थानों पर थानों पर हमले भी हुए हैं। इसको आप पुलिस की लाचारगी नहीं तो और क्या कहेंगे। लेकिन इसके लिए कई कारक जिम्मेदार हैं, जिन पर गंभीरता के साथ विचार की जरूरत है। मसलन पुलिस आम तौर पर निरपराधों को ही अपना निशाना बनाती है और अपराधियों से हफ्ता वसूलकर उन्हें बख्शती रहती है। इससे लोगों में आक्रोश भड़कना स्वाभाविक है। जब यह आक्रोश सीमा पार कर जाता है तो फिर बिना किसी अंजाम की परवाह किये लोग पुलिस से प्रतिशोध लेने की ठान लेते हैं। यदि पुलिस इस मामले में आत्मालोचन करे तो उसे आम लोगों के आक्रोश का कारण समझ में आ जाएगा। दरअसल पुलिस का चारित्रिक पतन ही उसकी इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। यदि पुलिस अपनी मूल ड्यूटी भूलकर सरकारी हितों को साधने के लिए काम करना शुरू कर दे तो इसे भी पुलिस के चारित्रिक पतन की श्रेणी में रखा जा सकता है। सिर्फ सरकार ही क्यों, पुलिस अफसरों के अलग अलग राजनीतिक आका होते हैं जिनमें विपक्ष के नेता भी शामिल हैं। उक्त तमाम कारकों का स्वाभाविक परिणाम यही होता है कि विभिन्न राजनीतिक नेताओं एवं राजनीतिक दलों से जुड़े अपराधियों पर पुलिस आम तौर पर हाथ नहीं डालती। कई बार पुलिस उन पर हाथ डालने की जुर्रत करती है तो उन्हें राजनीतिक कार्यकर्ताओं के गुस्से का शिकार होना पड़ता है। भोपाल में तो यह आए दिन की बात हो गई है कि सत्तारूढ़ दल के किसी भी कार्यकर्ता को पुलिस किसी आरोप में पकड़कर लाती है तो इस राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं का हुजूम पुलिस थाने पहुंच जाता है और पुलिस अफसरों और पुलिस कर्मियों से दुव्र्यवहार और कई बार तो झूमाझटकी करके उक्त आरोपी को छुड़ा ले जाता है। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में यही कुछ कांग्रेस करती थी जिसके इक्का दुक्का उदाहरण आज भी देखे जा सकते हैं। यदि पुलिस को इस दुर्गति से मुक्ति पानी है तो उसे चारित्रिक सुधार करना होगा और राजनीतिक कारणों से अपराधियों को पकडऩे या छोडऩे की प्रवृत्ति छोडऩी होगी। इसके साथ ही माफिया एवं अपराधियों के हाथों में खेलना और निरपराधों को उनके इशारे पर फंसाना बंद करना होगा लेकिन जब तक पुलिस के अभियान में सरकार का सहयोग न मिले, तब तक यह अभियान सफल होना संभव नहीं है।
-सर्वदमन पाठक

2 comments:

  1. जिसकी लाठी उसकी भैंस यह कहावत यूँही नहीं है ।

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  2. पुलिस तेरी यही कहानी ,
    कब का खत्म आखों का पानी ,
    जिस दिन पब्लिक ने भी ठानी ,
    उस दिन बनेगी इक नई कहानी ॥

    बरसों से यही तो देख रहे हैं .....

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